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महामारी के दौर में चुनाव और दो गज दूरी की मजबूरी, बता रहे हैं आर राजगोपालन

आर. राजगोपालन
Updated Wed, 26 Aug 2020 07:55 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

भारत ही नहीं, दुनिया भर में कोराना वायरस कहर ढा रहा है। लेकिन भारत में यह समस्या इसलिए भी बहुत बड़ी है कि यहां करीब 135 करोड़ की आबादी है और जन स्वास्थ्य प्रणाली उतनी मजबूत नहीं है। हमारे यहां की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली कई तरह की समस्याओं से जूझ रही है।



इस महामारी ने जहां हमारे देश में लोगों के सामाजिक जीवन, रोजगार, अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, वहीं राजनीतिक कामकाज को भी काफी प्रभावित किया है। कोरोना महामारी ने हमारी संसदीय व्यवस्था को खास तौर पर प्रभावित किया है। महामारी के कारण संसद का सत्र शुरू नहीं किया जा सका है, लेकिन ऐसी संभावना है कि आगामी सितंबर में संसद का शीतकालीन सत्र बुलाया जा सकता है।


तब तक सरकार विभिन्न तरह के उपायों पर विचार कर रही है और कोरोना महामारी के मद्देनजर विभिन्न तरह की सावधानियां बरतने की कोशिश कर रही है। लोगों को सुरक्षित दूरी बनाकर रहने के लिए कहा जा रहा है। दो गज की दूरी मौजूदा वक्त की मजबूरी बन गई है।


भारतीय शैली के प्रजातंत्र में यह दूरी विपक्ष के लिए असुविधाएं पैदा कर रही है। निश्चित रूप से कांग्रेस के उन सांसदों को, जो जरा-जरा सी बात पर सभापति की आसंदी की तरफ दौड़ पड़ते हैं और हंगामा मचाते रहते हैं, अभी ऐसा करने का मौका नहीं मिल पा रहा है।


कोरोना के कारण राज्य विधानसभाओं में भी इसी तरह की दिक्कतें आ रही हैं। उदाहरण के लिए, पुड्डुचेरी विधानसभा का सत्र एक पेड़ के नीचे आयोजित किया गया। ऐसा इस डर के कारण किया गया कि एसी से वायरस फैलता है। चेन्नई में तमिलनाडु विधानसभा का सत्र एक सार्वजनिक मीटिंग हॉल में खुले परिदृश्य में आयोजित किए जाने की संभावना है।


आइए, अब हम वास्तविक राजनीति की मूलभूत बातों की तरफ मुड़ते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के भविष्य का पूर्वानुमान क्या है! इसका चुनाव प्रचार आभासी तरीके से ही होने की संभावना है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में 2021 में क्या होने वाला है, इसके बारे में केवल सोचा ही जा सकता है कि राजनीतिक चुनाव प्रचार अभियान किस तरह से चलाया जाना चाहिए?


कोरोना महामारी का यहीं पर एक सकारात्मक पहलू नजर आता है कि इसने सोशल मीडिया को अनिवार्य बना दिया है। भारतीय जनता पार्टी तो 2014 से ही सोशल मीडिया पर सक्रिय और निर्भर थी, लेकिन अब द्रमुक, तेलुगू देशम पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, तृणमूल कांग्रेस जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के लिए भी यह मजबूरी बन गई है।
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कोई सोच भी नहीं सकता कि सिर्फ दक्षिण भारत में राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं द्वारा अनुमानित रूप से तीन लाख यूट्यूब प्राइवेट न्यूज वीडियो चैनल चलाए जा रहे हैं। घंटे भर में वीडियो वायरल हो जाता है। अगले वर्ष के प्रारंभ में तीन राज्यों- केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में राज्य विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं।


चुनाव आयोग ने कोरोना के परिदृश्य में चुनावों के संभावित शांतिपूर्ण संचालन के लिए दिशा-निर्देशों की घोषणा की है। लेकिन निश्चित रूप से महामारी का कुछ न कुछ असर चुनाव के प्रचार अभियान व मतदान पर जरूर पड़ेगा। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दो प्रमुख राजनीतिक दल हैं। इसी तरह केरल में माकपा और कांग्रेस, दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियां हैं।


इन विधानसभाओं का कार्यकाल मई, 2021 तक है। इसलिए स्वाभाविक है कि अगले वर्ष अप्रैल में या उससे पहले राज्य विधानसभाओं के चुनाव होने चाहिए। अगर कोरोना महामारी का कमोबेश प्रकोप जारी रहा, तो द्रमुक के एम के स्टालिन, अन्नाद्रमुक के एडापटी पलानीस्वामी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी किस तरह से अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, क्योंकि ये सभी नेता डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चुनाव प्रचार में उतने कुशल नहीं हैं।


द्रमुक कार्यकर्ताओं पर आधारित पार्टी है और अन्नाद्रमुक का एक बड़ा जनाधार है। लेकिन मतदाता इन दोनों पार्टियों से परेशान एवं निराश हैं। हालांकि जयललिता के निधन के बाद अन्नाद्रमुक ने पिछले चार वर्षों से पार्टी और सरकार को बरकरार रखा है। इसका श्रेय पलानीस्वामी और ओ पन्नीरसेल्वम के दोहरे नेतृत्व को जाना चाहिए।


इस बीच तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य में सुपर स्टार रजनीकांत, अभिनेता कमल हासन, विजय और सूर्या का प्रवेश हुआ है। सिनेमा जगत से राजनीति में आने वाले ये सभी नेता एम के स्टालिन की जीत में अड़चन पैदा करने वाले हैं। राजनीतिक टिप्पणीकार आर प्रसाद की राय में जहां तक बात सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली और रोग नियंत्रण की है, तो केरल के साथ तमिलनाडु ने देश के शेष हिस्सों के लिए मार्गदर्शक का काम किया है।


ऐसा कोई कारण नहीं है कि यह फिर से सफल न हो सके और कोरोना वायरस से जंग जीतकर फिर से चुनाव कराने की स्थिति में न आ जाए। अब जब वायरस से लड़ने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है, तो राज्य को सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है।


अब जरा राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर देखें। प्रशासन के साथ क्या हो रहा है? किसी भी परिस्थिति में कोरोना योद्धाओं का सम्मान किया जाना चाहिए, निश्चित रूप से आईएएस, आईपीएस जैसी अखिल भारतीय सेवा की तरह। इन अधिकारियों को अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। विदेशों में तैनात हमारे राजदूतों ने भी अपनी बेहतर सेवाएं दी हैं।


केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ट्वीट किया कि गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भूकंप और आपदा से निपटने का समृद्ध अनुभव इस महामारी से निपटने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम आया। कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक प्रशंसा पर गृह मंत्री अमित शाह ने ट्वीट करते हुए कहा कि सच्चाई स्वयं प्रमाण है, क्योंकि पूरी दुनिया देश में कोरोना वायरस से निपटने के उनके दृष्टिकोण के लिए प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर रही है।


शाह ने कहा कि हर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सुरक्षित महसूस कर रहा है और उन पर भरोसा करता है। वाकई सत्य स्वयं प्रमाण है। लेकिन जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहां के मतदाताओं की धारणा महत्वपूर्ण है। अब देखना है कि मतदाता अपना क्या फैसला देते हैं।

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