इस संबंध में मिस्र के प्रधान मुफ्ती डॉ. शौकी इब्राहिम अब्देल करीम अल्लाम का हालिया भारत दौरा (1-6 मई) महत्वपूर्ण हो जाता है। डॉ. शौकी का 'उम्माह' में विशेष स्थान है, तो उनके विचार असंख्य मुस्लिमों के लिए अनुकरणीय। अपनी इस यात्रा में उन्होंने एक बहुसंस्करणीय अंग्रेजी समाचारपत्र में कॉलम लिखते हुए आह्वान किया था, 'आधुनिक दुनिया के साथ इस्लाम को सामंजस्य बनाना, मुसलमानों के लिए आवश्यक हो गया है।'
ऐसा नहीं है कि एकेश्वरवादी अब्राहमी मजहबों में अपनी मान्यता, पहचान और जीवन शैली को सामयिक बनाने का प्रयास पहली बार हो रहा है। बीते कुछ दशकों में वैश्विक ईसाई मतावलंबियों के वर्ग ने अपनी कई कालबाह्य मजहबी अवधारणाओं को तिलांजलि देकर, तो यहूदियों ने अपनी मान्यताओं से समझौता किए बिना स्वयं को समयानुकूल बनाया है।
एक सदी पहले मुस्तफा कमाल पाशा अतातुर्क ने इस्लामी तुर्की को सेक्यूलर स्वरूप दिया था, जिसे बीते 20 वर्षों से घोर मजहबी वर्तमान राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप आर्दोआन से चुनौती मिल रही है। इसी तरह ईरान को आधुनिक हेतु शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने अपने दौर (1941-1979) में अभियान छेड़ा था। परंतु इस पर आक्रोशित आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने हिंसा के बल पर पहलवी को अपदस्थ करके वर्ष 1979-80 में ईरान को शरीयत अधीन इस्लामी गणतंत्र घोषित कर दिया। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं। प्रश्न है कि आखिर ऐसा क्यों होता है?
डॉ. शौकी के अनुसार, 'आतंकवादी हमला करने वाले मानसिक रूप से 'बीमार' और 'फ्रिंज माइनॉरिटी' हैं।' क्या इस्लाम के नाम पर जिहादी हमले और सुधार का विरोध करने वाले 'काफिर', 'कुफ्र' और 'शिर्क' रूपी मजहबी अवधारणा से प्रेरित हैं, जो मुसलमानों में गैर-मुस्लिमों के साथ अपने मुस्लिम बंधुओं के प्रति भी 'सह-अस्तित्व' की भावना को क्षीण नहीं कर देते हैं ?
सदियों से हिंदू समाज में अस्पृश्यता व्याप्त है, जिसके परिमार्जन हेतु समाज के भीतर से आवाज उठी। ऐसे सतत आंतरिक प्रयासों का परिणाम है कि स्वतंत्र भारत में आरक्षण- व्यवस्था लागू है और बौद्धिक स्तर पर छुआछूत का कोई समर्थन नहीं करता। इसी कारण देश में सती-प्रथा कोई मुद्दा नहीं, पर्दा/घूंघट प्रथा नगण्य, कन्या-भ्रूण हत्या पर कानूनी रोक, तो समाज दहेज, बाल-विवाह आदि के प्रति कहीं अधिक जागरूक है। यह सब इसलिए भी संभव हो पाया, क्योंकि इन कुरीतियों का वैदिक वांग्मय में कोई उल्लेख नहीं है। इस पृष्ठभूमि में क्या मुस्लिम समाज में भी स्वयमेव किसी परिवर्तन की अपेक्षा की जा सकती है?
अंतर-मजहबी संवाद के पक्षधर डॉ.शौकी ने अपने कॉलम में यह भी लिखा था, 'इस्लाम और भारतीय संस्कृति, अलग-अलग मूल्य प्रणालियां हैं। इन मतभेदों का सम्मान ही सह-अस्तित्व का आधार है।' जब मुफ्ती साहब ऐसा कहते हैं, तो यह तथ्य देखना होगा कि बहुलतावाद, पंथनिरपेक्षता और लोकतंत्र- अनादिकाल से भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब है। इसलिए सदियों पहले जब पारसी, यहूदी, सीरियाई ईसाई आदि अपने उद्गम स्थान पर मजहबी प्रताड़ना का शिकार होकर भारत में शरण लेने आए, तब उनका स्थानीय हिंदू शासकों और समाज द्वारा स्वागत किया गया, तो उन्हें उनकी पूजा-पद्धति का अनुसरण करने की सुविधा भी दी गई।
मिस्र के बहुसंख्यक मुसलमानों का अपनी पूर्व-इस्लामी सभ्यता के साथ कोई संघर्ष नहीं है। परंतु भारत में विरासत, संस्कृति और पूर्वज सांझे होने के बाद भी हिंदू-मुस्लिम में टकराव है। एक वर्ग ऐसा भी है, जो न केवल अपनी मूल पहचान से घृणा करता है, अपितु बाबर, गजनवी, औरंगजेब, टीपू जैसे आक्रांताओं को अपना प्रेरणास्रोत मानता है। विश्व भर की तमाम पूजा-पद्धतियों को चाहिए कि वे अपनी कालबाह्य अवधारणाओं को परिमार्जित करके उसे शाश्वत 'सह-अस्तित्व' की भावना से युक्त बनाएं। इस दिशा में इस्लाम को समकालीन बनाने का प्रयास तभी संभव है, जब इसके लिए मुस्लिम समाज के भीतर से निरंतर आवाज उठे।
- लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।