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मणिपुर: शांति-संवाद की कोशिशें चलती रहें, लेकिन पहले हिंसा रुके; अब तक 200 से ज्यादा लोगों की जा चुकी जान

अमर उजाला Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 19 Nov 2024 04:54 AM IST

सार

मणिपुर के हालात का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष से अब तक दो सौ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और साठ हजार से भी अधिक लोग विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। शांति और संवाद की कोशिशें चलती रहें, लेकिन सबसे पहली जरूरत यह है कि किसी भी तरह इस हिंसा को रोका जाए।
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मणिपुर हिंसा को नियंत्रित करते सुरक्षा बल (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एएनआई (फाइल)


उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष मई में इस विवाद की शुरुआत तो मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के साथ हुई थी, जिसका कुकी और नगा समुदाय विरोध करते रहे हैं। लेकिन पिछले एक वर्ष में जिस तरह से जंगल और जमीन, अवैध प्रवासी और ड्रग्स जैसे मुद्दे उभरे हैं, उससे यही मालूम होता है कि इस गतिरोध के कई आयाम हैं, जिनका जल्द समाधान ढूंढे जाने की जरूरत है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी यह बेहद गंभीर स्थिति है, क्योंकि नहीं भूलना चाहिए कि बांग्लादेश में हसीना सरकार के पतन के बाद वर्तमान परिस्थितियों में कुकी अलगाववादियों का हौसला बढ़ा है और अब वे म्यांमार की स्थितियों का फायदा उठाकर अपने पृथकतावादी एजेंडे पर काम करके सीमा पर मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।


मणिपुर के हालात का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि पिछले वर्ष मई से अब तक दो सौ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और साठ हजार से भी अधिक लोग विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। नेशनल पीपुल्स पार्टी द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के बावजूद राज्य की बहुमत वाली भाजपा सरकार पर बेशक असर न पड़े, लेकिन यह देखते हुए कि पूर्वोत्तर भारत में जातीय संबंध बहुत जटिल हैं और, एक बार हिंसा भड़क जाने पर उसका लंबा दौर चल सकता है, चुनौतियां अभी बाकी हैं। दरअसल, मणिपुर में समुदायों के समायोजन व सह-अस्तित्व के राजनीतिक प्रबंधन के जरिये हिंसा को दीर्घकालिक रूप से खत्म करने के प्रयास जरूरी हैं, लेकिन वर्तमान स्थितियों में सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि किसी भी तरह इस हिंसा को तत्काल रोका जाए।

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