लहार ठाकुरपुरा गांव (बबीना ब्लॉक, झांसी) में इसी नाम का विशाल, लगभग 87 एकड़ का तालाब आसपास के ग्रामीण इलाकों के लिए गौरवशाली धरोहर रहा है, पर हाल के वर्षों में जलकुंभी, मिट्टी-गाद आदि के चलते इसकी सुंदरता और उपयोगिता, दोनों कम होती जा रही थी। ऐसे में जब ‘परमार्थ’ संस्था ने तालाब की स्वच्छता के लिए जनसभा की, अभियान चलाया और प्रशासन से भी संपर्क किया, तो इसे काफी सहयोग मिला। मनरेगा के अंतर्गत अनेक हफ्ते तक तालाब की सफाई का अभियान चलता रहा। जलकुंभी और गाद की सफाई की गई तथा नहर का पानी तालाब में लाया गया। आसपास बाड़ लगाई गई और जमीन को पक्का किया गया।
हालांकि अभी रोशनी की व्यवस्था और मरम्मत का कार्य होना शेष है, फिर भी तालाब बहुत सुंदर बन गया है। इसकी जल-ग्रहण क्षमता बढ़ी है और पानी साफ है। गांववासियों ने बताया कि एक छोटी नहर निकाल कर इससे सिंचाई की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। इसके अलावा, चंदेल राजाओं के समय से चले आ रहे एवं 100 एकड़ से बड़े क्षेत्र में फैले मानपुर के तालाब (जो इसी ब्लॉक में स्थित है) में एक छोटी नहर की व्यवस्था पहले से परंपरागत तौर पर रही है, पर इसमें बहुत टूट-फूट हो गई थी। परमार्थ संस्था ने यहां एक विशेष प्रयास कर इस नहर के किनारों की मरम्मत की एवं तालाब की सफाई भी करवाई। इस कारण गांववासियों को सिंचाई का बेहतर लाभ मिल रहा है। यह कार्य ऐसे समय में गैर-मशीनीकृत उपायों से किया गया, जब यहां लोगों को रोजगार की बहुत जरूरत थी।
खजरा खुर्द गांव में पुराना तालाब नाम से विख्यात तालाब की उपयोगिता हाल के समय में सफाई न होने के कारण घट गई थी। परमार्थ संस्था व उससे जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं-‘जल सहेलियों’ ने इसे पुनर्जीवित करने के लिए अभियान चलाया। इसके बाद किनारों की मरम्मत, मिट्टी-गाद हटाने, आसपास वृक्षारोपण आदि के कार्य हुए। तालाब की जल-ग्रहण क्षमता बढ़ने के साथ इससे आसपास के कुंओं का जल-स्तर भी बढ़ा।
छतरपुर जिले (मध्य प्रदेश) के अंगरौठा गांव में महिलाओं ने 107 मीटर की नहर खोदने का कार्य बहुत कठिन परिस्थितियों में शुरू किया, ताकि यहां के सूखे पड़े तालाब में पानी पहुंच सके। बाद में उनके इस साहसी कार्य से प्रेरित होकर अन्य लोगों ने भी सहयोग किया। इसी जिले में गंगा नामक महिला ने अपनी सखियों के साथ एक उपेक्षित सूखे तालाब को फिर से पानीदार बनाया। इस तालाब के बारे में अंधविश्वास प्रचलित था कि जो इसका पुनरुद्धार करेगा, उसे हानि होगी, लेकिन गंगा ने लोगों को समझाया कि यह अंधविश्वास है और गांव की प्यास बुझाने का प्रयास इस कारण नहीं रुकना चाहिए। इन महिलाओं ने न केवल तालाब की सफाई की, बल्कि इसमें पानी भी पहुंचाया।
देश में बुंदेलखंड जैसे कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां जल-संतुलन में तालाबों की विशेष भूमिका है और इनके निर्माण व रख-रखाव के लिए परंपरागत तकनीक व सामाजिक तौर-तरीके, दोनों प्रशंसनीय रहे हैं। इनसे आज भी सीखा जा सकता है। चाहे सभी घरों में नल आ जाएं, पर इन तालाबों का महत्व बना रहेगा और इनके संरक्षण पर ध्यान देना जरूरी है। इनमें जमा गाद-मिट्टी हटाकर इसकी जल-ग्रहण क्षमता भी बढ़ाई जा सकती है व किसानों को उपजाऊ गाद-मिट्टी अपने खेतों के लिए मिल जाएगी। अनेक स्थानों पर भूजल स्तर पहले ही बहुत नीचे चला गया है। यदि बोरवेल आदि से नलों के लिए भूजल का उपयोग किया जाएगा, तो ऐसे में जल-संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि तालाबों में पहले से कहीं अधिक जल हो। इसलिए तालाबों की रक्षा एवं वर्षा जल संरक्षण का कार्य अब और महत्वपूर्ण हो गया है।