बीती 14 जुलाई को लखनऊ के राम मनोहर लोहिया लॉ कॉलेज के दीक्षांत समारोह में प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ का यह कहना मामूली घटना नहीं है कि कानून की पढ़ाई हिंदी में भी होनी चाहिए। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सबसे ज्यादा हिंदीभाषी जनसंख्या वाले राज्य की राजधानी में होने के कारण ही उन्होंने हिंदी के समर्थन की बात की।
लंबे समय से न्यायपालिका में हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में कामकाज किए जाने की मांग उठ रही है। अक्सर ऐसी मांगों पर न्यायपालिका ही ध्यान नहीं देती है। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट में हिंदी में अपील करने की छूट के बावजूद वहां नियुक्त होने वाले जज अक्सर हिंदी याचिकाओं की अंग्रेजी प्रति मांगते रहे हैं। या फिर कुछ हाईकोर्ट में ऐसी व्यवस्था है कि अंग्रेजी प्रति देनी ही होगी। इस वजह से हिंदी ही क्यों, अन्य भारतीय भाषाओं में भी न्याय मिलने का लक्ष्य लगातार पीछे छूटता रहा है। लेकिन अब लगता है कि न्यायपालिका भी इस दिशा में सचेत हो रही है। उसे इसका भान हो रहा है कि देसी भाषाओं में न्याय देने का वक्त आ गया है।
न्यायपालिका की सोच में ऐसा बदलाव पहली बार नहीं दिख रहा है। न्यायमूर्ति नजीर ने 27 दिसंबर, 2021 को हैदराबाद के एक कार्यक्रम में कहा था कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया का अब भारतीयकरण होना चाहिए। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ इसी बात को अब ठोस ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं। हिंदी या भारतीय भाषाओं के जरिये न्याय हासिल करने की राह में सबसे बड़ी बाधा संविधान के अनुच्छेद 348 की व्यवस्था है, जिसके अनुसार, अगर संसद कानून नहीं बनाती, तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी में ही सुनवाई करेंगे। ऊपरी तौर पर देखें, तो लगता है कि अगर संसद चाहे, तो वह आसानी से ऐसे प्रावधान कर सकती है। वैधानिक नजरिये से यह राह आसान लगती है, लेकिन भारतीय, खासकर हिंदी के नजरिये से मौजूदा राजनीतिक हालात को देखें, तो यह बात इतनी आसान भी नहीं है।
अगर संसद में बिना राजनीतिक सहमति के इस प्रावधान के संशोधन का प्रस्ताव आता है, तो राजनीतिक वितंडा खड़ा होने से कोई नहीं रोक सकता। जिस देश में अब भी कई राज्य हिंदी में स्टेशन और बस स्टैंड तक के नाम रखे जाने को क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़कर देखते हों, जहां नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं की वकालत के पीछे कुछ राजनीतिक दलों को हिंदी के वर्चस्ववाद की गंध लगती हो, वहां उच्च न्यायपालिका में भारतीय भाषाएं आसानी से लागू हो जाएं, संभव नहीं है।
कुछ महीने पहले गुजरात हाईकोर्ट में गुजराती में याचिका की वकालत वहां की बार एसोसिएशन ने की, तो वहीं के कुछ वकील उसके खिलाफ हो गए। इसकी वजह यह है कि ज्यादातर वकीलों की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से हुई है। गुजराती में लिखना-पढ़ना उनके लिए आसान नहीं है। इसलिए वे इसके विरोध में उतर आए। उत्तर प्रदेश में जमीन से जुड़े दस्तावेजों में खसरा और खतौनी जैसी शब्दावली आज भी प्रचलन में है। लेकिन अंग्रेजी माध्यम से पढ़े वकीलों को इस शब्दावली की जानकारी नहीं है। इसलिए वे इन्हें समझ भी नहीं पाते। जब वे समझ नहीं पाएंगे, तो न्याय क्या खाक दिलवाएंगे? इसलिए जरूरी है कि हिंदी ही नहीं, अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की कानूनी और दस्तावेजी शब्दावली की जानकारी कानून के छात्रों को दी जाए। स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई इसका आसान विकल्प हो सकती है।
न्याय की भाषा में कहा जाता है कि न्याय होना ही नहीं, होते हुए दिखना भी चाहिए। आम भारतीयों को न्याय मिलता है, तो अंग्रेजी में होने की वजह से आम लोगों को पता भी नहीं चलता कि उसे न्याय मिला भी है या नहीं। खुशी की बात है कि अब न्यायपालिका खुद समझने लगी है कि भारतीयों को न्याय देना है और उन्हें न्याय मिलते हुए देखने का अनुभव भी मुहैया कराना है, तो भारतीय भाषाओं में कानून की पढ़ाई होनी चाहिए।