राष्ट्रों ने जब यह समझा कि आर्थिक प्रगति नियमों पर आधारित विश्वव्यापी व्यापार के जरिये वैश्विक एकीकरण पर निर्भर करती है, तब करीब तीस साल पहले विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई। इन नियमों ने काफी दबाव झेला, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि पिछले कुछेक वर्षों में वैश्विक वार्षिक प्रगति शानदार रही है। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की दो अप्रैल, 2025 को घोषित टैरिफ योजनाओं ने मौजूदा संतुलन को बिगाड़ दिया। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि वह अमेरिका का शुद्ध निर्यातक है। ट्रंप की ताजा घोषणा के अनुसार, भारत को 25 फीसदी टैरिफ के साथ ही अतिरिक्त जुर्माना भी देना होगा, क्योंकि भारत रूस से तेल आयात करता है। अमेरिका और भारत के बीच बेशक समानांतर व्यापार बातचीत चल रही है, जिससे पता चला है कि ताजा टैरिफ स्थायी नहीं भी हो सकते हैं।
दो देशों के बीच व्यापार केवल अर्थशास्त्र पर नहीं, पारस्परिक व्यवस्थाओं पर भी निर्भर करता है, जिसमें देशों के बीच संबंध और आपसी धारणाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। भारत और ब्रिटेन के बीच हुआ हालिया समझौता और रूस के साथ भारत के व्यापारिक रिश्ते इसकी ही पुष्टि करते हैं। भारत पर लगे टैरिफ को अगर कुछ समकक्ष देशों, जैसे वियतनाम या इंडोनेशिया, जिन पर क्रमश: बीस और उन्नीस फीसदी टैरिफ है, के संदर्भ में देखें, तो इसका प्रभाव महत्वपूर्ण है और इससे भारत का प्रतिस्पर्धात्मक लाभ कम होगा। उसका यह लाभ जापान जैसे उन बड़े देशों की तुलना में भी कम होगा, जिनके अमेरिका से कम टैरिफ वाले समझौते हैं। भारत एक ऐसा व्यापार समझौता चाहता है, जो उसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अमेरिकी बाजारों में तरजीही पहुंच प्रदान करे। ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने आयात पर अपनी निर्भरता और आंतरिक राजनीतिक मजबूरियों को कम करने के लिए टैरिफ लगाए हैं। इससे सिर्फ भारत ही नहीं, कई देश परेशान हैं, जिससे इस वर्ष वैश्विक व्यापार कम रहने की पूरी आशंका है।
हमें आगामी महीनों में व्यापार समझौते पर चल रही वार्ताओं के निष्कर्ष पर पहुंचने का इंतजार करना होगा, जिससे दो महान देशों के बीच एक दीर्घकालिक समझौते की नींव रखी जा सकेगी। ऑटो और सार्वजनिक खरीद क्षेत्रों में हाल ही में हुए भारत-ब्रिटेन समझौते ने यह दर्शाया है कि भारत उन उद्योगों में अपने संरक्षणवादी टैग को हटाने को तैयार है, जहां यह सीमांत उत्पादक को प्रभावित नहीं करता, जो उसके पहले के रुख से एक महत्वपूर्ण बदलाव है। भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अलग-अलग वस्तुओं के आधार पर देखना होगा और अमेरिका तथा अन्य प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ के लिए अल्पकालिक आर्थिक झटके के लिए तैयार रहना होगा।