ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव रिपोर्ट के मुताबिक, टैरिफ के बाद भारत का करीब 5.4 लाख करोड़ रुपये का निर्यात प्रभावित हुआ है, जबकि भारत अमेरिका को अभी 7.59 लाख करोड़ रुपये का निर्यात करता है। इस तरह, निर्यात में 71 फीसदी गिरावट का अनुमान है।
टैरिफ से कपड़े, जेम्स-ज्वेलरी, फर्नीचर, सी फूड जैसे भारतीय उत्पाद महंगे हो गए हैं और इनकी मांग में लगभग 70 प्रतिशत की कमी आ सकती है। वहीं, चीन, वियतनाम जैसे कम टैरिफ वाले देश इन सामानों को सस्ती कीमत पर अमेरिका में बेच रहे हैं, जिससे अमेरिकी बाजार में भारत की हिस्सेदारी कम हुई है। एक अनुमान के मुताबिक, टैरिफ से भारतीय निर्यातकों की लागत दूसरे देशों के निर्यातकों की तुलना में 35 से 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जिसकी भरपाई करना भारतीय निर्यातकों के लिए आसान नहीं होगा।
टैरिफ से सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के निर्यातकों को सबसे अधिक नुकसान होने का अनुमान है, क्योंकि इस क्षेत्र की वित्तीय क्षमता कम है। यह क्षेत्र मुख्य तौर पर कपड़े, रेडीमेड कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, इलेक्ट्रिकल उत्पाद, लेदर के उत्पाद, फुटवियर, केमिकल उत्पाद, खाद्य व पेय पदार्थ, फर्नीचर, हैंडीक्राफ्ट्स, फार्मा, मेडिकल उपकरणों आदि का निर्यात करता है और इस क्षेत्र का देश के कुल निर्यात में 45 प्रतिशत से अधिक का योगदान है। भारत अमेरिका से शीर्ष पांच उत्पाद जैसे, क्रूड पेट्रोलियम, पेट्रोलियम उत्पाद, सोना, इलेक्ट्रोनिक कंपोनेंट्स और कोयला व कोक खरीदता है, जबकि पेट्रोलियम, दवा व फार्मा, मोती व महंगे पत्थर, इलेक्ट्रोनिक इंस्ट्रूमेंट्स, इलेक्ट्रोनिक मशीनरी व इक्विपमेंट्स आदि निर्यात करता है। वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान भारत ने अमेरिका को 6.75 लाख करोड़ रुपये का निर्यात किया था, जबकि आयात किया केवल 3.67 लाख करोड़ रुपये का। इस तरह, 10.42 लाख करोड़ रुपये के कुल कारोबार में भारत के लिए 3.07 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस ट्रेड बैलेंस रहा।
देश के बैंक निर्यातकों को मदद कर रहे हैं। प्री-शिपमेंट क्रेडिट के तहत बैंक, उत्पादों के निर्माण, कच्चे माल की खरीद, कामगारों को वेतन आदि के लिए ऋण मुहैया कराते हैं, जबकि पोस्ट-शिपमेंट क्रेडिट के अंतर्गत वे निर्यातकों को उनके माल का तुरंत भुगतान करके आयातकों से पैसों की वसूली का जोखिम खुद उठाते हैं। बैंक निर्यातकों के प्रतिनिधि के तौर पर लेटर ऑफ क्रेडिट (एलसी) के जरिये आयातक को भुगतान की गारंटी देते हैं और गारंटी के जरिये सौदा पूरा नहीं होने पर निर्यातकों को होने वाले संभावित नुकसान के जोखिम को कम करते हैं। एक्जिम बैंक निर्यातकों को वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात में सहायता उपलब्ध करता है, बैंकों के अलावा, उद्योग और सुरक्षा ब्यूरो (बीआईएस), सीमा शुल्क और सीमा सुरक्षा (सीबीपी), वाणिज्य विभाग, विदेश विभाग, और ट्रेजरी विभाग आदि सरकारी एजेंसियां भी निर्यातकों को मदद मुहैया कराती हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 29 दिसंबर, 2023 तक बैंकों द्वारा निर्यात के मद में दिए गए ऋण की आउटस्टैंडिंग 12,940 करोड़ रुपये थी, जो 26 जनवरी 2024 तक बढ़कर 20,489 करोड़ रुपये हो गई थी, लेकिन 27 जून 2025 तक यह राशि घटकर 13047 करोड़ रुपये रह गई। निर्यातकों को कम ऋण वितरित करने का मुख्य कारण अमेरिकी टैरिफ है, क्योंकि इसके कारण बैंक निर्यातकों को ऋण देने में सावधानी बरत रहे हैं। दरअसल, उन्हें लोन के एनपीए में तब्दील होने का डर सता रहा है। इसके अलावा, इस कारण अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात वॉल्यूम में भी गिरावट दर्ज की गई है। भारत में निर्यात ऋण अभी कुल मांग का मात्र 28.5 फीसदी है, जिसे अपेक्षित नहीं कहा जा सकता है, जबकि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वर्ष 2024 में निर्यात का 21.18 प्रतिशत का योगदान रहा था। इसके अतिरिक्त, निर्यातकों को मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों और मुद्रा के मौजूदा विनिमय दर से भी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि अमेरिकी टैरिफ से अमेरिका निर्यात करने वाले निर्यातकों खास करके एमएसएमई निर्यातकों को सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और वाणिज्यिक बैंकों की तरफ से राहत देने की जरूरत है, अन्यथा बैंकों पर एनपीए का दबाव बढ़ेगा साथ ही साथ यह निर्यात और भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वास्थ के लिए भी मुफीद नहीं होगा।