इस बारे में पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय द्वारा कागज, बोर्ड, धातु, कांच की पैकेजिंग समेत सेनेटरी उत्पादों के सुदृढ़ पर्यावरणीय प्रबंधन बाबत एक अप्रैल, 2026 से लागू होने वाले प्रस्तावित नियमों पर आगामी 60 दिनों में आमजन से सुझाव एवं आपत्तियां आमंत्रित की हैं। इन प्रस्तावित नियमों के पीछे मंशा है कि निर्माण एवं उपयोग करने वाले उद्यम विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व के माध्यम से पुन: उपयोग, पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण पर अमल करते हुए चक्रीय अर्थव्यवस्था को अंजाम देने में मददगार साबित हों। लेकिन प्रस्तावित नियमों में सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को दायरे से बाहर रखकर शायद लक्ष्य की पूर्ति में बाधा ही उत्पन्न की है, क्योंकि पैकेजिंग सामग्री का उपयोग मात्र बड़े उद्यमों द्वारा ही नहीं होता है, अपितु बहुत बड़ी मात्रा छोटे उद्योगों के माध्यम से भी उपयोग में ली जाती है। सामान्य तौर पर विगत एक दशक और अधिक से पैकेजिंग के लिए मूल रूप से प्लास्टिक को ही दोषी ठहराया जाता है, लेकिन प्लास्टिक से निजात पाने की कवायद में कागज, बोर्ड, धातु, कांच आदि भी पैकेजिंग के साधनों के रूप में बहुतायत से विकसित हो गए हैं। दुनिया में यदि पैकेजिंग की दृष्टि से देखा जाए, तो हम 11वें स्थान पर हैं, लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग तथा सामग्री के दिखावटी विपणन एवं साज-सज्जा के नाम पर पैकेजिंग सामग्री का बेतहाशा उपयोग किया जा रहा है।
प्रस्तावित कानून के दायरे में उत्पादक, आयातक और ब्रांड मालिक को तो लिया गया है, लेकिन पैकेजिंग सामग्री को अन्य उपयोगों यथा सजावटीकरण, भेंट आदान-प्रदान एवं अन्य उत्पादों में अप्रत्यक्ष रूप से उपयोग करने वालों का कहीं पर भी कोई उल्लेख नहीं है। बढ़ती आयोजन उद्यमिता में इस सजावट सामग्री के रूप में पैकेजिंग सामग्री का निरंतर उपयोग बढ़ता जा रहा है। इस दृष्टि से उक्त संवर्ग को भी शामिल करना न्यायोचित होगा, ताकि निरंकुश तरीके से उपयोग में आ रही सामग्री और उससे प्रभावित हो रहे पर्यावरण के बारे में भी जवाबदेही तथा संवेदनशीलता कायम हो सके। विभिन्न पैकेजिंग सामग्री को हतोत्साहित करने के लिए प्रस्तावित नियम निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, जिसमें 2026-27 में 70 फीसदी ईपीआर से लेकर 2028-29 में शत प्रतिशत के लक्ष्य को प्राप्त करना तय किया गया है। लेकिन इस संदर्भ में एक गंभीर आशंका यह भी उत्पन्न होती है कि ईपीआर की लागत के दृष्टिगत कहीं उसका आर्थिक बोझ आम उपभोक्ता की जेब पर न पड़ जाए।
पूर्व में प्लास्टिक पर लागू ईपीआर नियमों के रहते भी उसकी लागत में वृद्धि हुई और अंत में आम उपभोक्ता उससे प्रभावित हुआ। यदि उक्त नियम किसी भी रूप में कागज, धातु, कांच आदि के उत्पादन को धीरे-धीरे समाप्त करने एवं विकल्प के तौर पर नए पर्यावरणसम्मत पैकेजिंग सामग्री को विकसित करने पर केंद्रित होते, तो शायद पर्यावरण का अधिक कल्याण हो पाता। वर्तमान स्वरूप में तो, उद्योगों के लिए यह अत्यंत ही सरल है कि क्षतिपूर्ति राशि की अदायगी कर वे कितना भी कागज, धातु और कांच उपयोग में ला सकते हैं तथा उसे खुले में अथवा सह प्रसंस्करण माध्यम से निष्पादन के लिए छोड़ सकते हैं।
इस बाबत निर्माता और निष्पादनकर्ता के मध्य की सांठगांठ पर निगरानी रखना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन प्रस्तावित नियमों में एक कमी, जिसके दुरुपयोग की आशंका है, वह है ईपीआर दायित्वों को आगामी वर्षों में उपयोग हेतु ले जाना। अर्थात यदि क्षतिपूर्ति हेतु ईपीआर का उपयोग संबंधित वर्ष में नहीं किया जाता है, तो वह आगामी तीन वर्षों में अपेक्षाकृत कमी एवं तुलनात्मक रूप से कम राशि के विरुद्ध पूरित कर सकता है। नियमों को कठोर बनाते हुए किसी भी प्रकार की शिथिलता वांछनीय नहीं है एवं प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष उपयोगकर्ता दोनों ही दायरे में रहने चाहिए, तब ही इन सामग्री के उपयोग पर अंकुश लगेगा।