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अर्थव्यवस्था : बढ़ रहा है डिजिटल लेन-देन, इस चलन ने दी प्रतिकूल परिस्थितियों में ताकत

सतीश सिंह
Updated Mon, 24 Apr 2023 07:15 AM IST

सार

क्रेडिट कार्ड, यूपीआई व अन्य डिजिटल माध्यम से लेन-देन में बढ़ोतरी से साफ है कि प्रतिकूल स्थिति में भी भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है।
 
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डिजिटल लेन-देन (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : iStock


क्रेडिट कार्ड के तहत ग्राहकों को एक महीने तक कर्ज शून्य ब्याज दर पर दिया जाता है, लेकिन एक महीने की अवधि बीतने पर खर्च की गई राशि पर व्यक्तिगत कर्ज से अधिक ब्याज वसूल किया जाता है। ग्राहकों को इस सुविधा के एवज में वार्षिक शुल्क देना होता है। हालांकि, जिनकी क्रेडिट हिस्ट्री अच्छी होती है या जिनकी आय अधिक होती है, उनसे वार्षिक शुल्क नहीं लिया जाता है, जबकि यूपीआई लेन-देन खुद के खाते से किया जाता है। 


बीते मार्च में बैंकों ने 19.3 लाख क्रेडिट कार्ड जारी किए थे, जिससे क्रेडिट कार्डों की कुल संख्या बढ़कर 853 लाख हो गई। वर्ष 2022-23 में क्रेडिट कार्ड से किया जाने वाला खर्च 14 लाख करोड़ रुपये के स्तर को पार कर गया, जो 2021-22 की तुलना में 47.27 फीसदी अधिक है। वहीं, वर्ष 2020-21 में कुल डिजिटल लेन-देन 5,554 करोड़ किए गए थे, जो राशि में 3,000 लाख करोड़ रुपये था, जबकि 2021-22 में 8,840 करोड़ डिजिटल लेन-देन किया गया, जो राशि में 3,021 लाख करोड़ रुपये था। 


क्रेडिट कार्ड से किए जाने वाले खर्च में हाल में उल्लेखनीय तेजी आई है, पर कार्डों की संख्या में हुई बढ़ोतरी और किए गए खर्च के अनुपात में अंतर है, अर्थात जिस अनुपात में क्रेडिट कार्डों की संख्या बढ़ी है, उस अनुपात में खर्च नहीं बढ़े हैं। वर्ष 2022-23 में बैंकों ने 116.7 लाख नए क्रेडिट कार्ड जारी किए, जबकि 2021-22 के दौरान 111.5 लाख नए क्रेडिट कार्ड जारी किए गए थे। चूंकि, क्रेडिट कार्ड रहने पर ग्राहक को न तो अपने पास नकदी रखनी पड़ती है और न ही पैसे के खोने या चोरी होने का डर होता है, इसलिए, इसका इस्तेमाल समीचीन तरीके से करना हमेशा मुफीद होता है। बैंक क्रेडिट कार्ड्स बिजनेस पर इसलिए जोर देते हैं, क्योंकि इसकी गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) भी दूसरे बैंकिंग उत्पाद से कम है और मुनाफा भी अच्छा है। यूपीआई से लेन-देन करना बहुत सरल है, इसलिए रेहड़ी वाले, सब्जी वाले, ऑटो और रिक्शा वाले इसका खूब इस्तेमाल कर रहे हैं।  


कोरोना के प्रभाव के खत्म होने और वैश्विक सुस्ती का आंशिक प्रभाव देश पर पड़ने के कारण वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में लगातार वृद्धि हो रही है। बीते मार्च में जीएसटी संग्रह 1.60 लाख करोड़ रुपये रहा, जबकि जनवरी में यह 1.57 लाख करोड़ रुपये रहा था। वहीं, सकल व्यक्तिगत आयकर संग्रह 10 मार्च, 2023 तक 16.68 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया, जो वर्ष दर वर्ष के आधार पर 22.58 फीसदी अधिक है।   


आज दुनिया के विकसित देश मंदी की गिरफ्त में आने के कगार पर हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। मंदी के प्रमुख कारकों- जीडीपी, बेरोजगारी, महंगाई आदि के मामलों में भारत दुनिया के विकसित देशों से बेहतर स्थिति में है। फिलवक्त, भारत के तमाम पड़ोसी देशों सहित यूरोप और अमेरिका में महंगाई से हाहाकार मचा हुआ है, पर यहां महंगाई मार्च में घटकर 15 महीनों के निचले स्तर 5.66 फीसदी पर पहुंच गई। इधर, यूरोपीय देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गई हैं, पर रुपये की स्थिति उनके मुकाबले बेहतर है।


इस तरह, क्रेडिट कार्ड, यूपीआई और अन्य डिजिटल माध्यम से किए जा रहे लेन-देन में बढ़ोतरी और राशि में आ रही तेजी से साफ है कि कोरोना का बुरा वक्त गुजर चुका है, लोग अपने काम-धंधे पर लौट चुके हैं, उनकी कमाई ठीक-ठाक होने लगी है और वे खुलकर खर्च भी करने लगे हैं। वैश्विक मंदी का भी भारत पर न्यून प्रभाव पड़ा है, क्योंकि आर्थिक गतिविधियों में तेजी आ रही है और प्रतिकूल स्थिति में भी भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है।    

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