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समाधान: समावेशी विकास के लिए सहकारी आंदोलन जरूरी, तभी कम होंगी आर्थिक दरारें

शाजी केवी, अध्यक्ष, नाबार्ड Published by: शिव शुक्ला Updated Wed, 27 Nov 2024 07:40 AM IST

सार

नीतिगत पोषण से प्रेरित एक पुनर्जीवित सहकारी आंदोलन देश में अधिक समावेशी ग्रामीण आर्थिक समृद्धि का अग्रदूत हो सकता है।
 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : adobe stock


भारत में सहकारी आंदोलन को आगे बढ़ाने वाली प्रारंभिक शक्तियां भले ही अब कमजोर पड़ रही हों, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इस समय कई नई और जटिल उभरती चुनौतियां हैं, जिनके लिए सहकारी आंदोलन को नई दिशा और उस पर ध्यान देने की आवश्यकता होगी। इन नई चुनौतियों में किसानों की आय बढ़ाने से लेकर एक कुशल ग्रामीण आपूर्ति शृंखला हासिल करना, स्थायी आधार पर खाद्य मुद्रास्फीति को कम करना, कृषि के अलावा अन्य क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करना, कृषि उत्पादकता तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने वाले प्रयासों को बढ़ाना और डिजिटल क्षेत्र में अवसरों का लाभ उठाना शामिल है। सहकारी संस्थाओं के लिए मददगार नीतियां बनाने की दिशा में संयुक्त राष्ट्र महासभा की ‘सामाजिक विकास में सहकारी समितियों पर रिपोर्ट’ (2023) से जानकारी प्राप्त करना उपयोगी हो सकता है, जो इस बात पर जोर देती है कि ‘सहकारी समितियां बाजार संबंधी विफलताओं से निपटने, हाशिए पर पड़े लोगों को सशक्त बनाने, रोजगार के अवसर बढ़ाकर सतत विकास को सहारा देकर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं’।


भारत के सहकारी क्षेत्र में दूध और चीनी के क्षेत्रों में मिली अपार सफलता केवल एकीकृत दृष्टिकोण के महत्व को ही प्रमाणित करती है। इसका एक और अन्य सफल उदाहरण भारत की सबसे पुरानी श्रमिक सहकारी संस्था-उरालुंगल लेबर कॉन्ट्रैक्ट को-ऑपरेटिव सोसाइटी का है, जो इस वर्ष अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर रही है। सहकारिता के दो खास पहलू हैं, जिनमें पहला है, ‘सहकारी समितियों के बीच सहयोग’ का महत्व। जब उरालुंगल को एक सड़क परियोजना हेतु लिए गए भारी कर्ज की किश्तें चुकानी थीं, तो उसने 38 प्राथमिक सहकारी समितियों का एक संघ बनाया और उनकी मदद से यह भारी राशि जुटा सकी; दूसरा, निजी फर्मों के विपरीत, संकट की स्थिति में एक श्रमिक सहकारी समिति द्वारा रोजगार सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।


नाबार्ड सहकारी समितियों को एक-दूसरे के तुलनात्मक लाभों से लाभान्वित करने की सुविधा प्रदान कर इस आंदोलन को मजबूत करने के लिए ‘सहकारी समितियों के बीच सहयोग’ को बढ़ावा दे रहा है। इस पहल में वित्तीय पक्ष से जुड़ा एक महत्वपूर्ण बिंदु-सहकारी समितियों और उनके सदस्यों के मौजूदा बैंक खातों को विभिन्न वाणिज्यिक बैंकों में समेकित करना और उन्हें एक केंद्रीकृत जिला/राज्य सहकारी के तहत रखना होगा, जिससे सहकारी प्रणाली के संसाधन प्रणाली के भीतर ही बने रहेंगे।


भविष्य में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में नीतिगत तौर पर ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है। हाल के वर्षों में टमाटर, आलू और प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण दुग्ध क्षेत्र की तर्ज पर इन तीनों वस्तुओं के लिए अधिक से अधिक किसान उत्पादक संगठनों का गठन और एक एकीकृत आपूर्ति शृंखला मदद कर सकती है। उपलब्ध कृषि योग्य भूमि के पीढ़ी दर पीढ़ी बंटवारे को देखते हुए बागवानी फसलों की बिक्री से होने वाले लाभों के मद्देनजर विशेष रूप से बहु-राज्य सहकारी समितियों को उत्पादकों का एक व्यापक नेटवर्क बनाने की आवश्यकता हो सकती है। यह लागत को कम करने और उनकी मोलभाव करने की क्षमता में सुधार करने में मदद कर सकता है। भूमि स्वामित्व पर किसी भी जोखिम के बिना सहकारी समितियों द्वारा बड़े पैमाने पर भूमि पूलिंग जैसे क्षेत्रों पर ध्यान दे सकती है।


विश्व व्यापार संगठन के अनुरूप प्रसंस्कृत उत्पाद एक मजबूत कृषि-निर्यात उत्पाद क्षेत्र बनाने में मदद करने, तकनीक अपनाने, अधिक पारदर्शिता के साथ व्यापार करने में आसानी; प्रशिक्षण के माध्यम से क्षमता निर्माण और उद्यमी कारोबारी तंत्र के विभिन्न हिस्सों के रूप में कृषि स्टार्टअप के साथ अंतर्संबंधों को भी बढ़ावा देने की आवश्यकता होगी। सहकारी समितियों को नए उभरते नवप्रवर्तकों या नए कारोबारी विचारों की पहचान करने और उन्हें आगे बढ़ाने, वित्तीय और अतिरिक्त सहायताएं देने के लिए एक प्रणाली स्थापित करने की आवश्यकता भी हो सकती है। नीतिगत पोषण से प्रेरित एक पुनर्जीवित सहकारी आंदोलन देश में अधिक समावेशी ग्रामीण आर्थिक समृद्धि का अग्रदूत हो सकता है।

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