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युद्ध का अर्थशास्त्र: असली ताकत कीमत में नहीं, सोच में होती है; अनुकूलन और कम में ज्यादा करने वाला जीतता है

सार

हूती लड़ाकों के सस्ते ड्रोनों को पस्त करने के लिए अमेरिका अरबों डॉलर की मिसाइलें दाग रहा है। नतीजा, एक गरीब देश का गुरिल्ला गुट, जिसके ड्रोन खिलौनों से भी सस्ते हैं, अमेरिका और सऊदी अरब की नाक में दम किए हुए है। जंग में सस्ते द्वारा महंगे के घमंड तोड़ने की कहानी तीन हजार साल पुरानी है। हर बार जब ताकतवर ने सोचा कि उसकी महंगी ताकत अजेय है, किसी गरीब ने सस्ता हथियार उठाया और इतिहास पलट दिया।
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महंगा हथियार एक भ्रम है - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स
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विस्तार
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अक्तूबर 2026। लाल सागर। एक ड्रोन। कीमत करीब 2,000 डॉलर। प्लास्टिक, थोड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स, एक कैमरा, और एक वॉरहेड। यमन के हूती लड़ाकों ने इसे उड़ाया बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य की तरफ। उसे रोकने के लिए अमेरिकी नौसेना ने एसएम-2 मिसाइल दागी। कीमत-दो अरब डॉलर। 2,000 डॉलर का ड्रोन मारने के लिए इतनी महंगी मिसाइल।

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और यह सैकड़ों बार हुआ है। 2026 में अब तक 83 हमले हो चुके हैं होर्मुज और लाल सागर में। अमेरिका ने ईरान की जंग पर 37.5 अरब डॉलर खर्च किए हैं। सऊदी अरब का रक्षा बजट 87 अरब डॉलर है, जो दुनिया का छठा सबसे बड़ा है।

और हूती? एक गरीब देश का एक गुरिल्ला गुट, जिसके ड्रोन बाजार के अच्छे खिलौनों से सस्ते हैं। मगर उसका असर देखिए। होर्मुज से गुजरने वाले जहाज 90 प्रतिशत गिर गए हैं। बाब अल-मंदेब मार्ग से गुजरना मौत का खेल है। छह नाविक मारे जा चुके हैं। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर पार कर गया।
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टाइम मशीन के मुसाफिरो, यह कहानी नई लगती है। ड्रोन। मिसाइल। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर। मगर जंग में हमेशा सस्ते ने महंगे के घमंड को तोड़ा। यह कहानी तीन हजार साल पुरानी है। हर बार जब ताकतवर ने सोचा कि उसकी महंगी ताकत अजेय है, किसी गरीब ने सस्ता हथियार उठाया और इतिहास पलट दिया। आइए। सीट पकड़िए। बेल्ट बांधिए।

हम पहुंच गए हैं फ्रांस। तारीख 26 अगस्त, 1346। क्रेसी। इंग्लैंड का किंग एडवर्ड तृतीय 12,000 सैनिक लेकर जंग के मैदान पर डटा है। सामने फ्रांस के किंग फिलिप छठे और 30,000 से ज्यादा सैनिक। फ्रांसीसी सेना में यूरोप के सबसे महंगे योद्धा हैं-भारी बख्तरबंद, घुड़सवार। सिर से पांव तक लोहे में। घोड़े भी लोहे के कवच में ढके। फ्रांस को एक शूरवीर तैयार करने में वर्षों लगते हैं। तलवारबाजी, घुड़सवारी और हर तरह की जंग की ट्रेनिंग। एक शूरवीर तैयार करने की लागत आज के हिसाब से लाखों में। एडवर्ड के पास जंगजू कम हैं। उसकी सेना में हैं किसान। वेल्श और अंग्रेज गांवों के लड़के। लकड़ी का धनुष। छह फुट लंबा। तीर, लकड़ी के और उस पर लोहे की नोक। एक लॉन्गबो तीरंदाज को तैयार करने में बस कुछ महीने लगते हैं।

देखिए यलगार हो गई है। फ्रांसीसी शूरवीर दौड़ पड़े। एडवर्ड की सेना की तरफ से तीरों की बारिश हुई। एक मिनट में एक तीरंदाज और 12 तीर। 5,000 तीरंदाज, यानी हर मिनट 60,000 तीर। आसमान काला हो गया। घोड़े गिरे। बख्तरबंद शूरवीर जमीन पर। कीड़ों की तरह, उठ नहीं पा रहे। लोहे का बोझ, जो उन्हें बचाता था, अब उन्हें मार रहा था। फ्रांस की ताकत तबाह। एक लकड़ी के धनुष ने यूरोप का सबसे महंगा हथियार, यानी बख्तरबंद योद्धा को संग्रहालय भेज दिया। सस्ता लकड़ी का धनुष। महंगे लोहे से ढका घुड़सवार सैनिक। नतीजा सस्ता जीता।

टाइम मशीन फ्रांस में ही है, अब करीब 80 साल आगे चलते हैं। 25 अक्तूबर 1415। एजिनकोर्ट, फ्रांस। 69 साल बाद आप एक और जंग देख रहे हैं, मगर सबक, वही पुराना है। हेनरी पंचम याद हैं आपको, शेक्सपियर के हीरो। 6,000 थके, भूखे और बीमार अंग्रेजों की सेना लिए जंग के मैदान में हैं। सामने 20,000 से 30,000 फ्रांसीसी, फिर वही भारी बख्तरबंद जंगजू। और फिर वही हुआ। कीचड़ भरा मैदान। बारिश। भारी बख्तर कीचड़ में धंसा। लॉन्गबो के तीरों ने आसमान ढका। फ्रांसीसी शूरवीर कीचड़ में गिरे, उठ नहीं सके।

अंग्रेज किसानों ने उन्हें कीचड़ में मार डाला। तलवार से नहीं, हथौड़ों और कुल्हाड़ियों से। फ्रांस ने क्रेसी से कुछ नहीं सीखा था। उसने सोचा-महंगा मतलब ताकतवर। गलत। सस्ता फिर जीता।

अब टाइम मशीन कोरिया पहुंच रही है। साल है 1592। म्योंगन्यांग जलडमरूमध्य। स्क्रीन पर देखिए, एडमिरल यी सुन-सिन को। इतिहास के सबसे महान नौसेना कमांडरों में से एक, जिनका नाम बहुत कम लोग जानते हैं।

आपके नीचे जापान और कोरिया की जंग चल रही है। जापान ने कोरिया पर हमला किया। 300 से ज्यादा जापानी जंगी जहाज। कोरिया के पास  केवल 13 जहाज। यी सुन-सिन ने ‘कछुआ जहाज’ बनवाए हैं। इन्हें गोबुक्सन कहा जाता है। छोटे, लोहे की छत वाले, छत पर लोहे की कीलें, ताकि कोई चढ़ न सके। सस्ते। मजबूत। और घातक। जापानी जहाज बड़े थे, खूबसूरत थे, महंगे थे, मगर इस कछुए के सामने बिल्कुल बेबस।
म्योंगन्यांग जलडमरूमध्य की लड़ाई का नतीजा आपको अपनी सीट की स्क्रीन पर दिखेगा। कोरिया के 13 जहाजों ने 133 जापानी जहाजों को हराया। 31 जापानी जहाज डूबे। कोरिया का एक भी नहीं। चतुराई ने ताकत को तोड़ा। सस्ते ने महंगे को डुबोया।

और अब हम आ गए हैं वियतनाम।  साल 1965-1975। यही वह जंग है, जिसने ‘सुपरपावर’ शब्द का मतलब बदल दिया। अमेरिका इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी ताकत। बी-52 बमवर्षक। नैपाम। एजेंट ऑरेंज। 168 अरब डॉलर खर्च। आज के हिसाब से दस खरब डॉलर से ज्यादा। 58,000 अमेरिकी सैनिक मरे। वियतनामी गुरिल्लाओं के पास क्या था। कू ची की सुरंगें, 250 किलोमीटर लंबी, जमीन के नीचे पूरा शहर। बांस के जाल, जिनमें नुकीली कीलें लगी थीं। इन्हें पंजी स्टिक कहते हैं। लागत-शून्य। एके-47, 15-30 डॉलर की बंदूक और हो ची मिन्ह ट्रेल।

जंगल में पगडंडियां, जिन पर साइकिल से गोला-बारूद आता था। एक वियतनामी सैनिक साइकिल पर 200 किलो सामान लादकर पहाड़ पार करता था, अमेरिकी हेलिकॉप्टर ऊपर से देखता रहता, कुछ दिखता नहीं था। अमेरिका ने वियतनाम पर इतने बम गिराए, जितने दूसरे विश्वयुद्ध में कुल गिरे थे। 75 लाख टन। फिर भी हारा। सबसे ताकतवर वायुसेना सबसे सस्ती सुरंगों से हारी।

टाइम मशीन लौटते हुए ईरान के ऊपर से उड़ेगी। आपके नीचे है 2003-2011 का इराक। इराक के लड़ाकों ने आईईडी, यानी इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस का इस्तेमाल किया। सड़क किनारे बम। पुरानी तोप का गोला, कुछ तार, एक मोबाइल फोन-ट्रिगर। पूरे इंतजाम की लागत-महज 30 से 100 डॉलर। अमेरिका ने जवाब दिया, अपने माइन-रेजिस्टेंट एम्बुश प्रोटेक्टेड व्हीकल से। यह 20 अरब डॉलर का कार्यक्रम है। एक गाड़ी-पांच से दस लाख डॉलर।

इराक की सड़कों पर जो जंग जारी है, उसमें 30 डॉलर का बम करीब 10 लाख डॉलर की गाड़ी से लड़ रहा है। हजारों आईईडी फट रहे हैं हर दिन। अमेरिका ने ज्यादा गाड़ियां बनाईं, विद्रोहियों ने ज्यादा बड़े बम। होड़, जो कभी खत्म नहीं हुई। इराक में 3,500 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए। पेंटागन ने 20 अरब डॉलर खर्च किए सिर्फ आईईडी प्रूफ गाड़ियों पर। विद्रोहियों ने खर्च किए, शायद कुछ लाख। अनुपात देखिए-एक बनाम 10,000। टाइम मशीन वापस लौट रही है।

बाब अल-मंदेब में सऊदी से भिड़े हूती यमन का एक विद्रोही गुट है, जिसे दुनिया का कोई बड़ा देश मान्यता नहीं देता। उसके ड्रोन 2,000 डॉलर के हैं। शाहेद-136, जो सबसे महंगा ड्रोन है, उसकी कीमत भी 20,000 डॉलर से ज्यादा नहीं है। उसे रोकने वाले? एसएम-2 मिसाइल-21 लाख डॉलर। ईवॉल्वड सी स्पैरो-18 लाख डॉलर। अमेरिकी एमक्यू-9 रीपर ड्रोन, जो खुद तीन करोड़ डॉलर का है। हूतियों ने ऐसे सात ड्रोन गिराए। 20 करोड़ डॉलर हवा में जल गए।

सऊदी अरब का 87 अरब डॉलर का रक्षा बजट हूतियों के ड्रोन से अपने तेल टर्मिनल नहीं बचा पा रहा। तीन हजार साल का पैटर्न साफ है। महंगा हथियार एक भ्रम है। ज्यादा पैसा मतलब ज्यादा सुरक्षा का सिद्धांत बार-बार जंग में हारता है। हर बार इतिहास ने यही दिखाया। असली ताकत कीमत में नहीं, सोच में होती है। जो चतुर है, जो अनुकूलन करता है, जो कम में ज्यादा करता है, वही जीतता है। ईरान, यमन और यूक्रेन की जंग ने युद्ध का अर्थशास्त्र बदल दिया है।
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फिर मिलते हैं अगले सफर पर...

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