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धुंधली हुई आर्थिक तस्वीर

Wed, 22 May 2013 09:52 PM IST
सीएम वासुदेव
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संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल को काफी वाहवाही मिली थी। लेकिन इसका एक बड़ा कारण पूर्ववर्ती राजग सरकार की आर्थिक नीतियां भी थीं। राजग के कार्यकाल में आर्थिक सुधारों की गाड़ी बेधड़क आगे बढ़ी थी।
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हमें ध्यान देना चाहिए कि सुधारों का फायदा तुरंत नहीं मिलता। यह संभव नहीं है कि आज आप बैंकिंग संबंधी सुधार करें और उसका लाभ अगले महीने ही दिखने लगे।

अर्थव्यवस्था की दीर्घकालीन सेहत को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर आर्थिक सुधार संबंधी कदम उठाए जाने चाहिए। लेकिन दुखद है कि इस मोर्चे पर यूपीए सरकार ने बहुत देर कर दी। पूर्ववर्ती राजग सरकार ने आधारभूत संरचना को मजबूत करने की दिशा में भी काफी काम किया था।

लेकिन यूपीए के कार्यकाल में आधारभूत संरचना से जुड़ी कई अहम परियोजनाएं भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी न मिलने और अन्य कारणों से अटकी पड़ी रहीं। रही-सही कसर एक के बाद एक घोटाले ने पूरी कर दी।
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न्यायपालिका ने घोटालों के चलते दखल दिया, तो कई आवंटन रद्द हो गए, जिससे पूरे निवेश माहौल पर असर पड़ा। कुछ लोगों का तर्क है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की खराब हालत का असर हमारे यहां भी पड़ा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, पर मौजूदा बदहाली में तकरीबन 70 फीसदी योगदान घरेलू कारकों का है। नीतिगत अपंगता के चलते देश के कॉरपोरेट घरानों ने इस दौरान विदेशों में तो काफी निवेश किया है, पर वे यहां उसी तरह पैसा लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

यूपीए-एक के दौरान कई लोकलुभावनी योजनाएं लागू की गईं। मनरेगा और किसानों की कर्ज माफी उनमें अहम हैं। भारत जैसे मुल्क में जनहित से जुड़े कार्यक्रमों को लागू करना अनिवार्य आवश्यकता है क्योंकि यहां काफी बड़ी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी बसर कर रही है। पर इनकी अहमियत तब है, जब ये योजनाएं व्यावहारिक हों और उन्हें ठीक ढंग से लागू किया जाए।

मनरेगा और किसानों की कर्ज माफी योजना में भारी पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार से साफ हो चुका है कि इनसे सही व्यक्तियों को फायदा कम हुआ और सरकारी खजाने को चूना ज्यादा लगा। इसके अलावा सरकारी खजाने में आने वाले धन के उपयोग में संतुलन बेहद जरूरी है। करारोपण की मूल अवधारणा यह है कि अमीरों की जेब से कुछ पैसा निकालकर उसमें से कुछ हिस्सा गरीबों को दे दिया जाए और बाकी निवेश किया जाए। यूपीए सरकार ऐसा संतुलन बनाने में नाकाम रही।

भ्रष्टाचार के अलावा महंगाई के मोर्चे पर इस सरकार ने सबसे ज्यादा निराश किया। महंगाई पर लगाम कसने के लिए रिजर्व बैंक लगातार ब्याज दरों में इजाफा करता रहा, जिससे कारोबारियों और आम लोगों को मिलने वाले कर्ज महंगे होते गए। इससे निवेश प्रभावित हुआ और अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठ गया।

सरकार ने राजकोषीय घाटा कम करने के लिए ठोस कदम उठाने में बहुत देरी की। नतीजतन चालू खाते का घाटा बढ़ता गया। रुपये की कीमत में तेज गिरावट हुई। इस स्थिति में अगर हमारा निर्यात बढ़ता, तो वह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा होता। पर ऐसा हुआ नहीं, बल्कि आयात बढ़ता गया।

आर्थिक सुधारों की दिशा में यह सरकार एनडीए जैसे कदम क्यों नहीं उठा पाई, यह सवाल स्वाभाविक है। दरअसल, कांग्रेस मूल रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की अगुवाई वाले विकास मॉडल की समर्थक रही है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारें बैंकों और प्राकृतिक संसाधनों का राष्ट्रीयकरण करके इस दिशा में आगे बढ़ीं।

यह उनके लिए एक सैद्धांतिक मसला भी है। इसके विपरीत आर्थिक सुधार और निजीकरण जैसे मोर्चे पर भाजपा के सामने कोई सैद्धांतिक बाधा नहीं थी। मसलन, भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी बेचने के लिए विनिवेश मंत्रालय तक बना डाला था। कांग्रेस ऐसे बेधड़क कदम नहीं उठा सकी।

हालांकि तमाम नाकामियों के बीच यूपीए सरकार ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति, बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, संस्थागत विदेशी निवेशकों को निवेश संबंधी ढील देने संबंधी कुछ ठोस फैसले लिए हैं, लेकिन इनके नतीजे मिलने में वक्त लगेगा।

इसके अलावा सब्सिडी के बोझ को कम करने के लिए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने, डीजल की कीमतों में वृद्धि, सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों की सीमा तय करने जैसे कड़े कदम भी उठाए हैं। पी चिदंबरम ने वित्त मंत्रालय संभालने के बाद आर्थिक अनुशासन की दिशा में कदम बढ़ाया है, जिससे दम घुटती अर्थव्यवस्था को जरूर कुछ राहत मिली है, पर यह काफी नहीं है। सत्ता में बैठे नीति नियंता अगर कुछ वक्त पहले जाग जाते, तो सरकार इतनी भी अलोकप्रिय नहीं होती।
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