Durgawati Devi (File Photo)
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लखनऊ में पुराने किले पर एक प्रतिष्ठित शिक्षा संस्था है लखनऊ मांटेसरी इंटर कॉलेज, जिसकी नींव प्रसिद्ध क्रांतिकारी दुर्गा भाभी ने आजादी के बाद रखी थी। लखनऊ वह 1940 में ही आ गई थीं। मॉडल हाउस के बीच का हिस्सा उन्होंने किराये पर ले लिया था और कैंट रोड पर पांच बच्चों को लेकर ‘लखनऊ मांटेसरी’ की स्थापना की थी। वह स्कूल ही आज लखनऊ मांटेसरी इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है।
क्रांतिकारी आंदोलन में भाभी अपने पति भगवतीचरण वोहरा के साथ सक्रिय थीं। वे दोनों चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाले ’हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के शीर्ष सदस्यों में शुमार थे। भगवतीचरण को मुक्तयुद्ध के लिए चलाए जा रहे सशस्त्र क्रांतिकारी संग्राम का मस्तिष्क कहा जाता था। क्रांतिकारी दल को भगवती भाई भरपूर आर्थिक मदद भी देते थे। ‘साइमन कमीशन’ के विरोध में लाला लाजपत राय पर लाठियां चलाने वाले पुलिस अफसर सांडर्स को मारने के बाद भगत सिंह अपने केश कटवाकर सिर पर हैट लगाए भाभी के तीन वर्षीय बेटे शची को गोद में लेकर कोलकाता निकल गए थे।
ब्रिटिश सरकार के जन विरोधी कानूनों के विरोध में भगत सिंह ने आठ अप्रैल, 1929 को सेंट्रल एसेंबली में बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर बम विस्फोट किया था। कौन जाने कि उस अभियान पर जाने से पहले दिल्ली के निकाेल्सन पार्क में भाभी और सुशीला दीदी ने अपने रक्त से तिलक कर उन्हें अंतिम विदाई दी थी। उसके बाद भगत सिंह वाले मुकदमे में गिरफ्तार क्रांतिकारियों की मदद के लिए चंदा मांगने वाली चालीस-पचास महिलाओं में भाभी भी शामिल रहती थीं। संकट के समय भाभी यहां से वहां संदेश पहुंचाने का काम बड़ी सतर्कता से करती रहीं।
भगवतीचरण की शहादत दल के लिए बड़ा धक्का थी। उन क्षणों में चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें धैर्य बंधाते हुए कहा था, भाभी, तुमने देश के लिए अपना सर्वस्व दे दिया है। तुम्हारे प्रति हम अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलेंगे।’ पति की मृत्यु के बाद दुर्गा भाभी दूने वेग से क्रांति की राह पर चल पड़ीं। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को जेल से छुड़ाने के लिए आजाद चले, तो भाभी ने उसमें भाग लेने का आग्रह किया। पर आजाद ने इसकी स्वीकृति नहीं दी। वह शची को लेकर मुंबई पहुंचीं और पृथ्वीसिंह आजाद तथा सुखदेव राज के साथ लेमिंग्टन रोड पर गवर्नर पर गोलियां चलाईं।
भाभी के लाहौर के तीन और इलाहाबाद के दो मकान जब्त हो गए थे। भगवतीचरण के वारंट पर पहले ही सब कुछ कुर्क हो चुका था। ससुर ने जो चालीस हजार रुपये दिए थे, उनमें से कुछ क्रांतिकारी कार्यों में खर्च हो गए थे। तब राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने उनसे बहुत स्नेहपूर्वक कहा था, बेटी, मेरे यहां आकर रहो।’ भाभी उनके पास पांच-छह महीने रहीं, फिर चली आईं और अपने को गिरफ्तार कराया। बयान देने के लिए उन पर बहुत जोर डाला गया, पर वह भाभी झुकने वाली नहीं थीं।
आजाद भारत में भाभी को आदर और उपेक्षा, दोनों का सामना करना पड़ा। पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री दरबारा सिंह ने भाभी को 51 हजार रुपये भेंट किए, तो वे रुपये वहीं वापस करते हुए उन्होंने कहा, 'जब हम आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब किसी व्यक्तिगत लाभ या उपलब्धि की अपेक्षा नहीं थी। मैं चाहती हूं कि इस पैसे से यहां शहीदों का एक बड़ा स्मारक बनाने की शुरुआत की जाए जिसमें क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास का अध्ययन और अध्यापन हो।’
आजादी के बाद की राजनीति भाभी को रास नहीं आई। वर्ष 1937 में जब कुछ क्रांतिकारी साथियों ने गाजियाबाद से तार भेजकर भाभी से चुनाव लड़ने की प्रार्थना की, तो उन्होंने उत्तर दिया, चुनाव में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। अतः लड़ने का प्रश्न ही नहीं उठता।’
राजनीति को विदूषकों, चरित्र हनन करने वाले नेताओं और छिछोरे व्यक्तियों से मुक्त कराने की उनकी लगातार अपीलों पर भी किसी ने ध्यान नहीं दिया। अपने जीवन का शेष हिस्सा नई पीढ़ी के निर्माण के लिए अपने विद्यालय को समर्पित कर दिया था। अशक्त होने के बाद अपना कॉलेज किसी और के हाथों में सौंपकर वह बेटे के पास गाजियाबाद चली गईं और वहीं 14 अक्तूबर, 1999 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
दुर्गा भाभी ने देश की आजादी के संग्राम और भगत सिंह के समाजवादी सपने को जमीन पर उतारने के लिए उस समय अपना जीवन झोंक दिया था, जब स्त्री की स्वाधीनता और उसके अधिकारों के नारे हवा में नहीं थे। गोद में अबोध बेटा और पति का बलिदान भी उन्हें कर्तव्य पथ से विचलित नहीं कर सका। इन्कलाब की जो आग उनके भीतर एक बार धधकी थी, वह फिर बुझी नहीं कभी। वह अंतिम समय तक नई पीढ़ी में शहीदों की बेदाग छवियों को बहुत उम्मीद भरी नजरों से तलाश करती रहीं। यह विडंबना ही है कि मौजूदा स्त्री-विमर्श के बीच भाभी के क्रांतिकारी रास्ते को देखने-जानने की किसी को जरूरत नहीं।