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क्या शहादत भी धर्म और जाति पूछती है?

Sat, 04 Jun 2016 04:34 PM IST
राहुल सांकृत्यायन/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : Amar Ujala
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अब सब कुछ आसान हो गया है। हम 0-100 किलोमीटर की दूरी करीब करीब 90 मिनट में तय कर लेते हैं। सोशल मीडिया के इस जमाने में हम हर उस खबर से रुबरू हो जाते हैं जो हमसे कभी कभार छूट जाती हैं। हम ठंडे खाने को ओवन में फटाक से गर्म कर खा लेते हैं। कुछ ऐसा ही हाल हमारे देश में मुआवजों का हो चला है। किसी का बलात्कार हुआ तो न्याय से पहले मुआवजा मिलता है। कोई शहीद हुआ तो उसके लिए सरकार ने एक निश्चित धनराशि और परिवार के एक सदस्य को नौकरी तय कर ही रखी है। लेकिन इतना कुछ आसान हो जाने के बाद भी हम बहुत बड़ी उलझन में फंसते जा रहे हैं। जब मेरी राजनीतिक और प्रशासनिक समझ अपने शुरुआती दौर में थी तो मुझे लगता था कि ये जो हिन्दू मुस्लिम तुष्टीकरण की बात कही जाती है वो सिर्फ राजनीतिक गलियारों तक ही सीमित होगी। लेकिन बीते कुछ सालों में मेरी बढ़ती समझ के साथ मैंने यह महसूस किया है कि ये सिर्फ राजनीतिक गलियारों की बात नहीं ये तो अब इस मुल्क के हर इंसान के दिल ओ दिमाग में घुस चुकी है।
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अभी उत्तर प्रदेश के मथुरा में दो पुलिस कर्मी शहीद हो गए। पहला नाम एसएचओ संतोष कुमार यादव का और दूसरा एसएसपी मुकुल द्विवेदी का। मेरी समझ जहां तक इशारा करती है उस हिसाब से कोई भी सेना या पुलिस में मुआवजों के लिए तो कम से कम भर्ती नहीं ही होता होगा लेकिन उसे इस बात का एहसास जरूर रहता होगा कि वो जिस सरकार और जनता की सेवा में कई बार होली और दिवाली में घर नहीं जा पाता, उसके न रहने पर यही लोग उसके परिवार की मदद भी करेंगे। वो मानसिक, आर्थिक और सामाजिक तीनों हो सकता है। मैं जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन कर रहा था उसी दौरान मार्च में प्रतापगढ़ के कुंडा स्थित बलीपुर में तैनात क्षेत्राधिकारी जिया उल हक की हत्या कर दी गई थी। उत्तर प्रदेश सरकार को आए हुए साल भर बाद ही इतनी बड़ी घटना ने हिलाकर रख दिया और आनन फानन में सरकार की ओर से मुआवजों की घोषणाओं का दौर शुरु हो गया।

सरकार की ओर से उनके परिवार को  50 लाख रुपए मुआवजा दिया गया, दिवंगत जिया की पत्नी परवीन आजाद को लखनऊ पुलिस मुख्यालय में विशेष कार्याधिकारी और छोटे भाई सोहराब अली को गोरखपुर पुलिस महानिरीक्षक कार्यालय में आरक्षी (कल्याण) का पद भी दिया गया। हो सकता है कि सरकार उस समय दबाव में रही हो और उसने ऐसा फैसला ले लिया। जिया उल हक की हत्या के बाद आगरा में 30 मई को क्राइम ब्रांच के आरक्षी सतीश, 5 जून को सहारनपुर स्थित थाना चिलकाना में तैनात आरक्षी राहुल राठी, बरेली में 7 जून को कैंट थाना क्षेत्र में तैनात आरक्षी चालक अनिरुद्ध यादव भी बदमाशों की गोलियों का शिकार हो गए थे। इन शहीद पुलिसकर्मियों के परिवारों के लिए अन्य निधियों के अलावा सरकार की ओर से 10 लाख रुपए की ही अनुग्रह राशि मंजूर की गई थी।
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फिर 24 जून 2013  को इलाहाबाद के ही थाना प्रभारी आर पी द्विवेदी की हत्या गोली मारकर हत्या कर दी। उनके परिवार को इस बात की उम्मीद थी कि सरकार द्वारा उन्हें भी जिया उल हक के परिवार की तरह मुआवजा मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीते साल 2015 में गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) के दादरी स्थित बिसाहड़ा में मो. अखलाक की हत्या ने सपा सरकार को फिर से दबाव में ला दिया। जिसके बाद सरकार की ओर से परिजनों को पहले 20 लाख रुपये देने का ऐलान किया गया था लेकिन बाद में  यह राशि बढ़ाकर 45 लाख रुपये कर दी थी।



अखिलेश सरकार की ओर से अखलाक के तीन भाइयों को पांच-पांच लाख रुपये दिए गए। साथ ही परिवार के लोगों को फ्लैट और नौकरी भी दी गई। इस मामले ने हद से ज्यादा राजनीतिक तूल पकड़ा और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भी इसमें कूद पड़े थे। उन्होंने तो बाकयदा टीवी, रेडियो और अखबारों में विज्ञापन तक दिए। इसी घटना के बाद साल 2016 के मार्च में डॉक्टर पंकज नारंग की हत्या कर दी गई लेकिन उस मामले पर किसी ने कुछ नहीं बोला। ऐसा क्यों हुआ ये तो मैं भी नहीं जानता।

अब बात करते हैं मथुरा में शहीद हुए दो पुलिस कर्मियों की। इनके साथ भी वही हुआ जो शहीद आर पी द्विवेदी के साथ हुआ। हालांकि इनके परिवार को 20 लाख रुपए मुआवजा देने की बात कही गई थी लेकिन लगातार बढ़ते दबाव और अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव पर  कथित तौर पर आरोप लगते हुए देख अखिलेश ने शहीद एसपी मुकुल द्विवेदी और संतोष यादव के घरवालों को 50-50 लाख रुपये,  सरकारी नौकरी और असाधारण पेशन देने की घोषणा कर दी है। एक जागरूक नागरिक होने के बावजूद भी न जाने क्यों मैं अब यह मानने को तैयार ही नहीं हूं कि सरकारें धर्म के नाम पर तुष्टीकरण नहीं करतीं। गलत है ये। आप ऐसा मानक बनाए ही क्यों जो आगे चल के आप के लिए ही किसी समस्या का कारक बने। सपा सरकार पर हर बार एकपक्षीय होने का आरोप लगता रहा है। जो अब मेरी निगाह में भी सच साबित होने की ओर है। क्या शहादत भी धर्म और जाति पूछती है अखिलेश जी? क्या केजरीवाल को सिर्फ अखलाक की मौत दिखी, पकंज नारंग की हत्या सुसाइड थी?



शहादत धर्म और जाति देख कर नहीं आती। किसी की हत्या अगर पूरे समाज में रची बसी मानवता की हत्या है तो किसी को मुआवजा देने में दो रवैया क्यों अपनाया जा रहा है? क्या वर्दी का रंग दो अलग अलग धर्म के लोग पहने तो कुछ अंतर हो जाता है ? अगर सबका खून लाल है तो इस तरह की दो आंख हमारी सरकारें और नेता क्यों कर रहे हैं? क्या हम सेक्युलर राष्ट्र सिर्फ 26 जनवरी और 15 अगस्त को ही हो पाते हैं? या फिर एकपक्षीय हो कर किसी को अतिरिक्त लाभ देना हमारा सेक्युलरिज्म है? हमें इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है, नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब कोई एक दूसरे की मदद भी नहीं करेगा साहब। आपका क्या नेताजी? आप तो जेड प्लस सिक्योरिटी में चलते हैं। आपकी गाड़ी जाम में फंस जाए तो एकाध की नौकरी पर तलवार लटक ही जाती है।

बेहतर हो कि सरकारें अपना नजरिया और रवैया दोनों बदले। वोट के लिए शहादत की कीमत न लगाएं। शहीदों को उनका उचित सम्मान दें और हर घटना के बाद ये मुआवाजा देने की बात कह कर अपना पल्ला झाड़ने से बचे। तभी आप, मैं और हम सभी सुरक्षित रह सकते हैं।
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