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अकाल से जूझते मराठवाड़ा का दर्द

Thu, 04 Apr 2013 11:12 PM IST
बंधुराज लोणे
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संत एकनाथ महाराज ने 350 वर्ष पहले मराठवाड़ा के पैठण में अकाल के समय एक गधे को पानी पिलाकर उसकी जान बचाई थी। आज महाराष्ट्र के इस क्षेत्र में जनता पानी के लिए तरस रही है। लेकिन जनता के लिए कोई संत एकनाथ महाराज सामने नहीं आया है।
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इस बार महाराष्ट्र के 11 जिलों में अकाल पड़ा है। पानी के लिए जनता दर-दर भटक रही है। वह अकाल मौत का शिकार हो रही है। सूखे का सबसे ज्यादा असर मराठवाड़ा पर पड़ा है। मराठवाड़ा के जालना, उस्मानाबाद, नांदेड़, परभनी, बीड़ में भयंकर सूखे की स्थिति है। बीड़ जिले से लोग पलायन भी कर रहे हैं।

मराठवाड़ा में गोदावरी नदी बहती है, साथ ही कुछ छोटी नदियों का भी वरदान इस क्षेत्र को मिला है। इसके बावजूद यह क्षेत्र आज सूखे से जूझ रहा है। यहां सिंचाई की सुविधा के लिए तीस साल पहले गोदावरी नदी में जायकवाड़ी पर बांध का निर्माण किया गया था।
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इस बांध से औरंगाबाद जैसे शहर की प्यास बुझाई जाती है और जालना, परभनी, नांदेड़, हिंगोली जिले के किसानों को पानी दिया जाता है। लेकिन आज इस बांध में सिर्फ चार फीसदी पानी ही बचा है, परिणास्वरूप आधा मराठवाड़ा पीने के पानी के लिए तरस रहा है।

महाराष्ट्र में सूखा या अकाल कोई नई बात नहीं है। स्वतंत्र भारत में महाराष्ट्र में सबसे बड़ा अकाल 1972 में पड़ा था। उस वक्त बड़ी संख्या में मराठवाड़ा से लोगों ने मुंबई की तरफ पलायन किया था। इस बार भी बड़ी संख्या में लोग बाहर जाने को मजबूर हो गए हैं। हालांकि 1972 और मौजूदा अकाल में बहुत फर्क है।

उस समय पानी तो था, लेकिन लोगों के पास अनाज नहीं था। आज अनाज तो मिल जा रहा है, मगर पीने के लिए दो बूंद पानी नहीं है। मराठवाड़ा ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के कई अन्य भागों में भी बांध सूखे पड़े हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक ने राज्य में पानी के लिए हिंसा होने की संभावित चेतावनी दे रखी है।

1972 के अकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक ने बहुत मजबूती से कार्य किया था। नाईक गांव-गांव घूमकर जनता के बीच गए और उन्हें राहत दी। महाराष्ट्र में उसी वक्त रोजगार गारंटी योजना बनाई गई थी। कमोबेश यही योजना आज पूरे देश में लागू है। जबकि महाराष्ट्र के नेता खासकर मंत्रीगण आज मराठवाड़ा के लोगों के बीच जाने की जरूरत ही नहीं महसूस कर रहे हैं। जबकि महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री चाहे किसी भी पार्टी का रहा हो, मंत्रिमंडल में पश्चिम महाराष्ट्र का वर्चस्व हमेशा रहा है।

मगर इसी के हिस्से मराठवाड़ा की ओर सरकार का ध्यान नहीं है। यहां तक कि राज्यपाल के अभिभाषण तक में इसका जिक्र नहीं था। स्थिति इतनी भयावह है कि मराठवाड़ा के कई गांवों में लोग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। उन्हें दिन भर टैंकरों का इंतजार करना पड़ता है। और जब टैंकर दिखता है, तो पूरा गांव उसके पीछे ऐसे भागता है, मानो उसने अमृत की खोज कर ली हो। कभी शिवसेना-भाजपा की सरकार ने महाराष्ट्र को टैंकरमुक्त करने की घोषणा की थी। मगर आज सूबे में न केवल टैंकरों की संख्या बढ़ गई है, बल्कि ये भ्रष्टाचार के साधन भी बन गए हैं।

राज्य में वर्ष 1972 से आज तक नौ बार सूखे की स्थिति पैदा हुई है। सूखे और अकाल की स्थिति से निपटने के लिए पूर्व में छह आयोग भी नियुक्त किए जा चुके हैं, मगर इनकी रिपोर्ट कहां धूल खा रही है, शायद ही हुक्मरान को पता है। अकाल के संदर्भ में एक और विचित्र स्थिति दिख रही है।

सूखे से सर्वाधिक प्रभावित सोलापुर और उस्मानाबाद जिलों में जनता जहां पानी को तरस रही है, वहीं चीनी मिलें जोरों से चल रही हैं। सोलापुर में महाराष्ट्र की सबसे अधिक 33 चीनी मिलें हैं। यह बताने की जरूरत नहीं कि गन्ने की फसल में ज्यादा पानी की जरूरत होती है। सरकार गन्ने के लिए तो पानी का इंतजाम कर रही है, मगर लोगों के लिए पीने के पानी का इंतजाम नहीं कर रही है।

कुल मिलाकर, यह विडंबना ही है कि राज्य में सूखे पर राजनीति हावी हो गई है, जिसका खामियाजा अंततः आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। स्थिति दिनों दिन बदतर होती जा रही है। क्या सत्ता प्रतिष्ठान इसकी सुध लेगा?
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