तब मैं अट्ठारह साल की थी। मेडिकल कॉलेज में भर्ती होने के लिए एक बार मैमनसिंह से ट्रेन में अखौड़ा होकर सिलेट जा रही थी। अखौड़ा स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर बैठते हुए भैया ने कहा, दाहिनी ओर देखो, वही भारत है। भैया की बात सुनकर मेरे शरीर का रोयां-रोयां सिहर उठा। मैं तब सेंजुति नाम की कविता पत्रिका की संपादक थी। उस पत्रिका में पश्चिम बंगाल के कविगण कविताएं लिखते थे। भैया ने बताया, तो समझ में आया कि पश्चिम बंगाल के वे कविगण उस ओर रहते हैं, और मैं इस तरफ।
आसमान की ओर देखने पर पाया कि पक्षी इधर से उधर उड़ रहे हैं। भैया से कहा, चलिए न भैया, भारत से घूमकर आते हैं। उन्होंने कहा, आगे बॉर्डर है। वहां से आगे जाने नहीं देंगे। मैं बॉर्डर समझ नहीं पाई। भैया ने कहा, बॉर्डर पार करने नहीं देंगे। जबर्दस्ती आगे बढ़ने पर हमें गोली मार दी जाएगी। उस दिन स्टेशन पर बैठे-बैठे बॉर्डर मुझे यमदूत सरीखे लगे थे। अगले साल भैया मुझे अपनी नई मोटर साइकिल पर हलुआघाट ले गए थे। वहां के मिशनरी अस्पताल में भैया किसी से बात कर रहे थे, और मैं बरामदे में बैठकर सामने के पहाड़ की ओर देख रही थी।
थोड़ी देर बाद भैया आकर कहने लगे, वह पहाड़ भारत में है। तुरंत मुझे ख्याल आया कि फिर तो वहां भी बॉर्डर होगा और आगे नहीं जाने देंगे। कुछ साल बाद सिलेट के तामाबिल में घूमने गई, तो वहां भी बॉर्डर देखा। वहां मुझे दिखा कि सिर्फ चिड़िया नहीं, मुर्गी-बतख और गाय-बकरियां भी आराम से बॉर्डर पार कर रही हैं। सिर्फ लोगों को ही रोका जा रहा है। यह पृथ्वी और ये मनुष्य तभी से मुझे बहुत निर्मम लगते हैं। आत्मनिर्भर होने के बाद वीजा-पासपोर्ट के जरिये मैंने खुद सीमा पार की है। कोलकाता को देखते हुए कहीं से भी ऐसा नहीं लगा कि मैं किसी दूसरे देश में आई हूं।
एक ही मिट्टी, एक ही आकाश, एक ही तरह के पेड़-पौधे, एक जैसे घर, एक जैसे लोग, एक ही इतिहास-फिर इसे दूसरा देश क्यों कहना पड़ेगा! उपन्यासों के जरिये मैं कोलकाता की हर गली के बारे में जान चुकी थी। मैंने मां से सुना था कि मेरे नाना ईद की खरीदारी के लिए कोलकाता आते थे। ज्यादा खरीदारी के लिए कोलकाता के सिवा विकल्प ही नहीं था। भारतवर्ष तो मेरे मां-पिता का अपना देश ही था। मैंने विभाजन नहीं देखा। लेकिन विभाजन की वेदना अपने अंदर महसूस कर सकती हूं। शरणार्थियों की पीड़ा मुझे अपनी पीड़ा लगती है।
धर्म की तरह बॉर्डर पर लगे कांटेदार तार भी मैं नहीं मानती। इकहत्तर का युद्ध मैंने देखा है, और यह भी देखा है कि भारत-विभाजन के मूल मंत्र को इकहत्तर के युद्ध में किस तरह मुंह की खानी पड़ी। बाद में यात्राओं के क्रम में मैंने कई और देशों की सीमाएं लांघी। ऐसे हर अवसर पर साथ में बांग्लादेश का पासपोर्ट होने के कारण मुझे अपमानित होना पड़ा। चाहे किसी दूसरे देश की संसद में भाषण देने के लिए जाने का अवसर हो, मानवाधिकार का पुरस्कार लेने जाने का मौका या किसी विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि लेने जाने का अवसर हो, इमिग्रेशन अधिकारियों की संदेह भरी आंखें मेरे चेहरे पर से कभी नहीं हटीं।
शायद उन्हें लगता रहा हो कि गरीब देश की यह स्त्री समृद्ध विकसित देशों में बस जाना चाहती है। संयुक्त राष्ट्र का ट्रेवल डॉक्यूमेंट साथ में होने के बाद भी मैं कभी आश्वस्त नहीं हो पाई। स्वीडिश पासपोर्ट मिलने के बाद मैंने यूरोप-अमेरिका का अबाध भ्रमण किया। अमूमन स्वीडन के गोरे लोगों के पासपोर्ट की जांच नहीं की जाती, लेकिन मेरे स्वीडिश पासपोर्ट को कई बार मशीन में जांचने के लिए डाला गया कि कहीं यह फर्जी तो नहीं है। एक समय था, जब यूरोप के देश एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते रहते थे। अब वे सभ्य हो चुके हैं।
उन्होंने विभाजन की दीवारें तोड़ दी हैं। यूरोप के एक देश से दूसरे देश में जाने के दौरान सीमा पर अधिकारी ध्यान से वीजा-पासपोर्ट पर नजर भी नहीं गड़ाते। यूरोपीय संघ से दूसरे देशों को एकता का सबक सीखना चाहिए। सार्क और आसियान के देश वर्षों से बैठक कर रहे हैं। लेकिन आज भी वे साझा मुद्रा या सीमा खत्म कर देने जैसे मुद्दों पर सहमत नहीं हो पाए। मैं वर्षों से एक ऐसी दुनिया का सपना देख रही हूं, जिसमें सरहदें न हों। मैं एक ऐसी दुनिया का सपना देखती हूं, जिसमें कोई बिना किसी बाधा के एक सिरे से दूसरे सिरे तक आ-जा सके।
बेहतर जीवन जीने की उम्मीद में हर दौर में लोग एक जगह से दूसरी जगह में जाकर बसते रहे हैं। जगह-जगह सीमाएं बनाकर मनुष्य के उस सपने को ध्वस्त कर दिया गया है। हालांकि मेरी तरह अनेक लोग हैं, जो सीमा विहीन पृथ्वी का सपना देखते हैं। यूरोप के कई संगठन मिलकर 'एक पृथ्वी-एक पासपोर्ट' का आंदोलन चला रहे हैं। पेरिस स्थित यूनेस्को की बिल्डिंग में ये लोग मानवाधिकार पर आयोजन करते हैं। इन्होंने अनेक लोगों के साथ मुझे भी 'यूनिवर्सल सिटिजनशिप पासपोर्ट' दिया है।
यह एक प्रतीकात्मक पासपोर्ट है, जिसमें नाम, जन्मतिथि, पासपोर्ट नंबर और पासपोर्ट जारी करने की तारीख के अलावा और कुछ लिखा हुआ नहीं है। आज भले ही इस पासपोर्ट की मान्यता न के बराबर हो, लेकिन मैं समझती हूं कि एक न एक दिन ऐसा आएगा, जब सभ्य देश इसका महत्व समझेंगे और इसे मान्यता देंगे। मैं यह भी उम्मीद करती हूं कि एक दिन सरहदों पर कांटेदार तार लगाने की जरूरत खत्म हो जाएगी। मैं सपना देखती हूं कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब यूरोप के एक देश से दूसरे देश में जाने की तरह ढाका से कोलकाता और दिल्ली से इस्लामाबाद तक बिना बाधा के चली जाऊंगी, कोई मुझसे पासपोर्ट नहीं मांगेगा।
पिछले कई वर्षों से भारत में रहते हुए मैं खुद को बांग्लादेश की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हूं। भारतीय गणतंत्र आज जिस तरह सिर उठाकर खड़ा है, पड़ोस के दो देश-यानी पाकिस्तान और बांग्लादेश- उस तरह खड़े नहीं हैं। बेशक भारत में आज भी अनेक समस्याएं हैं, सांप्रदायिक सद्भाव भी कई बार टूटता है, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में सांप्रदायिक सद्भावना बनाए रखने की क्षमता है। भारत के अल्पसंख्यक मुसलमान पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं की तुलना में कहीं बेहतर स्थिति में हैं। काश, भारत से निकले ये दोनों पड़ोसी भारतीय आदर्श को अपना पाते!