अरे ओ, गोदान वाले होरी! तुम इस देश में 'हीरो' होने का मुगालता मत पालो, क्योंकि सिर्फ मात्राओं के उलटफेर से हैसियत नहीं बदल जाती। पोस्ट ऑफिस में पचास रुपयों की आरडी खोलने वाले रइसो! तुम्हें नहीं मालूम कि शेयर बाजार का सेंसेक्स क्या चीज है। मानसून के भरोसे जिंदा रहने वाले पपीहो! समर्थन मूल्य के भरोसे कभी कोई किसान समर्थ नहीं हो पाता। टोपियां बदलने पर खोपड़ियां बदलने की उम्मीद पालने वाले आशावादियो! तुम यह क्यों भूल जाते हो कि भेड़ पर ऊन कोई नहीं छोड़ता। भेड़ चाल के लिए बदनाम वोटरो! तुम यह मत भूलो कि हर चमकदार वस्तु सोना नहीं होती।
सूरत शहर का ख्वाव पालने वाले बनारसियो! अपना पान चबाओ और अस्सी घाट में डुबकी लगाओ। चीनी की मिठास के गुलामो! देश में शुगर की बीमारी बढ़ी जरूर है, मगर ज्यादातर गरीब इस बीमारी की गिरफ्त में नहीं हैं। भेड़-बकरियों की तरह ट्रेन के डिब्बे में ठुसे यात्रियो! तुम इस मुगालते में मत रहना कि किराया बढ़ने पर ट्रेन में सुरक्षा भी बढ़ जाती है। हरी सब्जियों के दामों को देखकर हर्षाने वाले सावन के अंधो! यह हरियाली हमेशा नहीं रहने वाली है। रसोई गैस पर कुकर चढ़ाने वाले रसोइयो! चंद महीनों की मोहलत को ‘पैरोल’ समझकर एन्जवाय करो, गैस की बढ़ी कीमत तुम्हें ‘जेल’ का मजा देगी ही।
सरकार से चमत्कार की उम्मीद लगाए जादू-प्रेमियो! तुम यह क्यों भूल जाते हो कि बिहार के दशरथ मांझी को पहाड़ काटकर रास्ता बनाने में पूरे बाईस वर्ष लगे थे। आलू-प्याज के निर्यात की बंदिश पर जश्न मनाने वाले दीवानो! तुम यह मत भूलो कि ज्यादा खुशी आंसू निकाल देती है। पंचवर्षीय योजना को पलीता लगाने वाले परमानेंट गरीबो! तुम्हारे चक्कर में योजना आयोग शीर्षासन की मुद्रा में आ गया है। रसरंजन के रसिक बुद्धिजीवियो! तुम इस मुगालते में मत रहना कि सरकार तुम्हारी विचारधारा को मान लेगी। अच्छे दिनों की उम्मीद में वर्तमान को स्याह करने वाले स्वप्नजीवियो! तुम यह क्यों भूल जाते हो कि किसी के भी सभी सपने पूरे नहीं होते।