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संदेह पैदा करती है यह तेजी

विभूति नारायण राय
Updated Tue, 11 Apr 2017 07:15 PM IST
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विभूति नारायण राय
जासूसी की दुनिया जितनी दिलचस्प होती है, उससे अधिक कारुणिक। खास तौर से पकड़े जाने के बाद तो जासूस के पल्ले सिर्फ करुणा बचती है। सबसे पहले तो वही उसे पहचानने से इन्कार कर देता है, जिसके लिए वह काम कर रहा होता है। काम कराने वाले अक्सर उसे भुगतान इस तरह करते हैं, जिसका कोई दस्तावेजी सबूत नहीं होता। अत: उसके आश्रित भी कोई कानूनी दावा नहीं कर सकते।


कुलभूषण जाधव को तीन मार्च, 2016 को बलूचिस्तान में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों ने पकड़ा और यह दावा किया कि वह भारतीय नौसेना में कार्यरत कमांडर स्तर के अधिकारी हैं और फर्जी दस्तावेजों के जरिये पाकिस्तान में रह रहे थे। उनका एक वीडियो पर दर्ज बयान पाकिस्तानी मीडिया में बार-बार दिखाया गया, जिसमें उन्होंने इकबाल किया था कि वह रॉ के लिए काम कर रहे थे।


भारतीय विदेश मंत्रालय ने फौरन ही इसका खंडन करते हुए एक बयान जारी किया कि जाधव 2002 में ही नौसेना छोड़ चुके थे और अब ईरान में रहकर अपना व्यापार कर रहे थे।


जाधव की कहानी में कई पेच हैं। सबसे बड़ा मसला तो यह है कि उनका वीडियो पर प्रसारित बयान सुरक्षा बलों की अभिरक्षा में दर्ज किया गया था, इसलिए उसे विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता।


भारत और पाकिस्तान दोनों ब्रिटिश परंपरा से प्राप्त कानूनों से संचालित हैं और दोनों की न्यायिक परंपरा में पुलिस के समक्ष दर्ज इकबालिया बयान मान्य नहीं होता। पाकिस्तानी जांचकर्ताओं के पास संभवत: जाधव के बयान के अतिरिक्त कोई और साक्ष्य नहीं था और शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के विश्वस्त तथा विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने कुछ ही महीने पहले राष्ट्रीय असेम्बली में कहा था कि पाकिस्तानी सरकार के पास कुलभूषण जाधव को दंडित करने के लिए पर्याप्त पुख्ता सबूत नहीं हंै। यह अलग बात है कि उनके इस बयान पर विरोधी दलों और मीडिया ने इतनी हाय-तौबा मचाई कि नवाज शरीफ की सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ गई और उसे कहना पड़ा कि अभी तफतीश जारी है।


यह आम जानकारी है कि भारत से संबंधों को लेकर पाकिस्तान में सैनिक और असैनिक नेतृत्व एक ही सफे पर नही हैं। पिछले चुनाव में नवाज ने भारत से संबंध सुधारने को भी अपने एजेंडे में रखा था, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कभी भी वहां की सर्व शक्तिशाली सेना ने उन्हें इस दिशा में काम नहीं करने दिया। पार्लियामेंट और मीडिया में उनके राजनीतिक विरोधी भी जाधव के मसले पर उन पर नरमी बरतने का आरोप लगाते रहे हैं। यहां तक कहा गया कि पिछले वर्ष सुरक्षा परिषद में दिए गए अपने भाषण में जानबूझ कर उन्होंने जाधव का जिक्र नहीं किया था।


जाधव को दंडित करने में जितनी तेजी दिखाई गई, वह भी संदेह पैदा करती है। मौजूदा साक्ष्यों के बिना पर किसी खुली नागरिक अदालत में मुकदमा चला कर उसे दंडित करना असंभव था, इसलिए बंद कमरे में एक फौजी अदालत ने उसका मामला सुना और उसे सजा सुना दी। फौजी अदालत भी हाल में गठित आतंकवाद निरोधी अदालत नहीं थी, जिसमें न्यायाधीश के रूप में फौजी अधिकारी बैठते हैं और जो सीमित अर्थों में ही सही, नागरिक अदालतों की तरह काम करती है। यह फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल थी, जो पाकिस्तान आर्मी ऐक्ट के तहत संचालित होती है और न सिर्फ उनमें बैठने वाले जजों की कानूनी काबिलीयत हमेशा संदिग्ध रहती है, वरन उनके सामने पेश होने वाले नैसर्गिक न्याय के तहत प्राप्त वकील, दलील और अपील जैसे बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रहते हैं।
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जाधव को भारतीय दूतावास द्वारा 13 बार मांगने के बावजूद काउंसलर ऐक्सेस की सुविधा नहीं दी गई। आम तौर से जासूसी के मामलों में फांसी का दंड सिर्फ लड़ाई के दौरान दिया जाता है और फिलहाल तो भारत पाकिस्तान युद्ध में नहीं हैं। हमारे सामने तमाम उदाहरण हैं, जब शीतयुद्ध में लिप्त अमेरिका और सोवियत रूस ने पकड़े गए जासूसों की अदला-बदली की थी। भारत और पाकिस्तान दोनों की अदालतें एक दूसरे के जासूसों को विभिन्न अवधि की जेल की सजाएं देती ही रहती हैं। फिर अचानक कुलभूषण जाधव को मृत्युदंड देने की जरूरत क्यों आन पड़ी? कराची के दैनिक डॉन ने भी इस फैसले को असाधारण कहा है। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे एक कड़ा संदेश बताया, पर इस समय जब दोनों देशों की सरकारें तनाव कम करने की बातें कर रही हैं, इस तथाकथित कड़े संदेश का औचित्य क्या है? कहीं इसके पीछे कोई और कारण तो नही है?


इस बीच बड़े रहस्यमय घटनाक्रम के तहत पाकिस्तानी फौज का एक रिटायर्ड ले. कर्नल मो. हबीब जाधव को सजा सुनाए जाने के पांच दिन पहले नेपाल में लापता हो गया। किसी ने छद्म टेलीफोन नंबर से उसे नेपाल बुलाया और वहां आखिरी बार उसे भारत-नेपाल सीमा के करीब लुम्बिनी में देखा गया। छह अप्रैल से उसका किसी से संपर्क नहीं हो पा रहा। पाकिस्तानी मीडिया आरोप लगा रहा है कि रॉ ने उसका अपहरण कर लिया है। क्या वह आईएसआई के लिए काम कर रहा था? अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना बहुत मुश्किल है, लेकिन उसके गायब होने के पांच दिन के अंदर ही कुलभूषण जाधव को फांसी की सजा सुनाने के पीछे कुछ न कुछ संबंध लगता जरूर है। बहरहाल, सच जानने के लिए हमें कुछ दिन और इंतजार करना पड़ेगा। इसके लिए भी कि क्या कुलभूषण जाधव की कथा का कारुणिक अंत होगा या कूटनीतिक कार्यवाहियों से उसकी जान बच पाएगी?
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