फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दवा है या जहर की खुराक

Mon, 26 Aug 2013 07:36 PM IST
सुभाष चंद्र कुशवाहा
विज्ञापन
विज्ञापन
अमेरिकी शीर्ष चिकित्सा अनुसंधान केंद्र, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने भारत में चिकित्सकीय परीक्षण अनुसंधान टाल दिया है। वह अब अपनी सरकार के माध्यम से हमारी सरकार पर यह दबाव डलवा रही है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दवा परीक्षणों के लिए सख्त कदम उठाए जाने के निर्देश का वह कोई हल निकाले, नहीं तो दवा उद्योग के विकास में बड़ी बाधा खड़ी हो जाएगी।
विज्ञापन


उसका तर्क है कि इससे नई कारगर दवाएं बाजार में नहीं आ पाएंगी, जिसका नुकसान अंततः भारत जैसे गरीब मुल्कों को ही उठाना पड़ेगा। लेकिन यहां सवाल यह है कि आखिर अमेरिकी कंपनियां अपने नागरिकों को परीक्षण के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल करतीं।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष एक जनवरी को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों द्वारा भारतीय नागरिकों पर किए जा रहे गैरकानूनी परीक्षणों पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उसने यह भी कहा था कि भविष्य में कोई भी परीक्षण दवा कंपनियों के गिरोहों द्वारा मनमाने तरीकों से नही किए जाने चाहिए, बल्कि केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की निगरानी में होने चाहिए। उसने मुआवजे की भी बात कही है।
विज्ञापन


जाहिर है, अमेरिकी दवा कंपनियों को भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह हस्तक्षेप अच्छा नहीं लग रहा है, क्योंकि पहले जहां वे बेरोकटोक सस्ते में अपनी दवाओं का परीक्षण कर रही थीं, अब उन्हें न्यायालय के दिशा-निर्देश के कारण कुछ परेशानी महसूस हो रही है।

आखिर ये दवा कंपनियां अपने देशों में इसीलिए तो परीक्षण नहीं कर पा रहीं कि वहां मनुष्य की कीमत ज्यादा है, तमाम प्रतिबंध हैं और सीधे मुनष्य पर परीक्षण करने के पूर्व, प्रथम चरण में चूहों, बंदरों या दूसरे जानवरों पर प्रयोग किया जाता है। वहां नुकसान की भरपाई के लिए भी अत्यधिक मुआवजा देना पड़ता है।

दरअसल, अपने देश में नई अर्थव्यवस्था के पैरोकारों ने 2005 में दवाओं के परीक्षण के प्रतिबंधों को उदार बनाकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आसान मौका उपलब्ध करा दिया था। इस मौके का फायदा उठाते हुए दवा कंपनियों ने गरीब, अनपढ़ भारतीयों, मुख्यतः आदिवासियों पर नई दवाओं का प्रथम चरण का परीक्षण शुरू किया।

इन परीक्षणों में कितने लोगों का स्वास्थ्य खराब हुआ, इस संबंध में ठोस आंकड़े नहीं हैं, पर 2005 से 2012 के बीच अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों की दवा कंपनियों के परीक्षण से देश में 2,800 से ज्यादा रोगियों की मौत हो चुकी है। इनमें से अधिकांश को कोई मुआवजा तक नहीं मिला। इस पूरे मामले का स्याह पक्ष यह है कि इन गरीब आदिवासियों को दवा परीक्षणों के बारे में बताया तक नहीं गया। आलम यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इन वर्षों में 1.5 लाख से ज्यादा मरीजों पर 1,600 दवाओं के परीक्षण कर डाले।

बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने 100 से ज्यादा आदिवासी लड़कियों को बिना उनके अभिभावकों की अनुमति के अच्छे वेतन के लालच में दवा परीक्षण के लिए नौकरी पर रखा। छात्रावास में उन पर किए गए दवा परीक्षण के कारण अधिकांश लड़कियां मर गईं। भोपाल गैस पीड़ितों पर जहरीली गैस प्रभाव के परीक्षण के लिए बिना पीड़ितों को बताए 11 परीक्षण कर डाले गए। यह सारा खेल तब सामने आया, जब इस संदर्भ में एक जनहित याचिका दायर की गई।

देखा जाए, तो यह पूरा मामला बेहद अमानवीय और परीक्षण हेतु भारत जैसे गरीब मुल्कों को शिकार बनाने का एक षड्यंत्र है। 1940 का बना भारतीय दवा और सौंदर्य प्रसाधन कानून इतना लचर और प्रभावहीन है कि उसकी आड़ में दवा कंपनियां अपना हित साधती रहती हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के कड़े रुख के बाद हमारे स्वास्थ्य मंत्री ने भी संसद को बताया था कि दस विदेशी दवा कंपनियों में परीक्षण के दौरान 2010 में मारे गए 22 लोगों को औसतन दो लाख 38 हजार का मुआवजा दिया गया है, जबकि इसके पूर्व मुआवजा का कोई मामला प्रकाश में नहीं आया है। बहरहाल, सवाल यह है कि ऐसी अमानवीय नीतियों के सहारे मानवता का झंडाबरदार बनने वाले अमीर मुल्क दुनिया के गरीब और पिछड़े मुल्कों की सार्वभौमिकता का अतिक्रमण नहीं तो और क्या कर रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें