उत्तर प्रदेश का शाहजहांपुर एक ऐसा अनूठा शहर है, जो आजादी की लड़ाई में शहीद हुए तीन व्यक्तित्वों से जुड़ा है- रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह। आजादी की सशस्त्र लड़ाई के दौर में लखनऊ से सटा यह शहर क्रांतिकारियों का एक बड़ा ठिकाना था। काकोरी कांड आजादी की उस लड़ाई की सबसे रोमांचक घटनाओं में से था और उसे अंजाम देने वालों में शाहजहांपुर के इन क्रांतिकारियों ने बड़ी भूमिका निभाई थी।
नौ अगस्त, 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी में रेल का सरकारी खजाना लूटने की घटना ब्रिटिश सत्ता को एक खुली चुनौती थी। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अंजाम दी गई उस कार्रवाई में कुल 10 नौजवानों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद उत्तर भारत के इन तीन बड़े क्रांतिकारियों को 19 दिसंबर, 1927 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। काकोरी कांड में शामिल एक और दिग्गज क्रांतिकारी राजेंद्र लाहिड़ी को दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही फांसी दे दी गई थी।
देश की आजादी के लिए रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और रोशन सिंह का एक साथ फांसी के फंदे पर झूलना कौमी एकता की बड़ी मिसाल बन गया था। इसलिए भी इस दिन को याद करने का महत्व है। रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान गहरे मित्र थे। उन्होंने सोच-समझकर क्रांति का यह रास्ता चुना था। अशफाक उल्ला खान समृद्ध परिवार से थे। तब ब्रिटिश प्रशासन में प्रभावी स्थिति में रहे एकाध लोगों ने उन्हें फांसी से बचाने की पेशकश की थी, पर अशफाक ने उसका विरोध किया था।
रामप्रसाद बिस्मिल को हम सिर्फ क्रांति के एक योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे कवि के रूप में जानते हैं, जिनकी पंक्तियां रगों में आग लगा देती थी। परिवार की माली हालत ठीक न होने के बावजूद क्रांति के उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलना उन्होंने स्वीकारा था। बिस्मिल का जहां जन्म हुआ था, उसे उनकी मां ने बाद में बेचकर दूसरा सस्ता भूखंड खरीद लिया था। यानी बिस्मिल का जहां जन्म हुआ था, वहां आज किसी और का घर बसा है।
बहुत बाद में स्थानीय प्रशासन ने बिस्मिल की जन्मभूमि को खरीदने की पहल की थी, ताकि उसे स्मारक का रूप दिया जा सके। लेकिन उसके लिए उसने जितने पैसे की व्यवस्था की, उसमें वह घर या जमीन नहीं खरीदी जा सकती थी! इतने भर से ही संतोष कर लेना पड़ता है कि बिस्मिल के मोहल्ले में उनकी आदमकद प्रतिमा लगी है।
अशफाक उल्ला खान की कब्र उनके घर से कुछ दूर उनके खानदानी कब्रिस्तान में है। लेकिन उसकी दुर्दशा देखकर धक्का लगता है। मुख्य दरवाजा बुरी तरह ध्वस्त है। मजार स्थल का भी वर्षों से जीर्णोद्धार नहीं हुआ। किनारे की रेलिंग लोग उखाड़ ले गए हैं। यहां शहीद की कब्र के पास कुछ लोग ताश और लूडो खेलते दिखते हैं।
प्रताप के यशस्वी संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ने अशफाक की शहादत पर उनके भाई रियासत उल्ला से कहा था, तुम इनकी कच्ची कब्र बनवा देना। पक्की हम करवा देंगे। और इनका मकबरा हम ऐसा बनवाएंगे, जिसकी नजीर उत्तर प्रदेश में नहीं होगी। उसके तीन वर्ष बाद कानपुर के सांप्रदायिक दंगे में विद्यार्थी जी शहीद हो गए और अशफाक की मजार को पक्का करने का उनका सपना पूरा नहीं हो पाया।
ठाकुर रोशन सिंह का घर शाहजहांपुर शहर से करीब चालीस किलोमीटर दूर नवादा गांव में है। वहां जन्मस्थान पर उनकी प्रतिमा लगी है। आकर्षक और रोबीले व्यक्तित्व के रोशन सिंह अशफाक और बिस्मिल से उम्र में बड़े और अचूक निशानेबाज थे। लेकिन आजादी के इतिहास में उनका जिक्र बहुत कम होता है। शाहजहांपुर नगरपालिका के प्रांगण में इन तीनों शहीदों की मूर्तियां जरूर लगी हैं। लेकिन एकाध सामाजिक संगठनों के अलावा शायद ही कोई इन्हें याद करता है।
साझा विरासत की वह लौ आज मद्धिम पड़ गई लगती है। जिन शहीदों की मजार पर मेले लगने की आरजू कभी कवियों ने की, वहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है। वतन पर मरने वालों के निशां की इस दुर्दशा पर कोई भी राष्ट्रभक्त शर्मिंदा हो सकता है। सरकारी और प्रशासनिक तौर पर इन्हें याद करने की कोशिशें कम रह गई हैं, तो हमारा समाज भी देश के इन सपूतों को भूलता जा रहा है।