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मगर दिलों को मत बांटिए

Wed, 09 Oct 2013 08:22 PM IST
के जी सुरेश
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तेलंगाना के गठन की मंजूरी मिलने के साथ ही आंध्र प्रदेश विरोध की आग में जल उठा है। स्थिति यह है कि पूरा सीमांध्र पंगु बना हुआ है, बिजली आपूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाएं ठप हैं, लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और राज्य को अरबों रुपये का नुकसान हो रहा है। आजादी मिलने के बाद से हैदराबाद राज्य के तेलुगूभाषी लोग तेलंगाना की मांग कर रहे थे। तेलुगू भाषा को छोड़कर तेलंगाना के लोगों और राज्य के रायलसीमा और तटीय आंध्र जैसे अन्य क्षेत्रों के लोगों में कम ही समानताएं हैं।
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अतीत से देखें, तो तटीय आंध्र और रायलसीमा क्षेत्रों के विपरीत, जो ब्रिटिश काल में मद्रास प्रेसिडेंसी के अंतर्गत थे, तेलंगाना कभी ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं रहा। 1953 में भाषायी आधार पर राज्य के बंटवारे को लेकर गठित राज्य पुनर्गठन आयोग भी भाषा की समानता के बावजूद आंध्र प्रदेश में तेलंगाना को शामिल करने पर सहमत नहीं था। अपनी रिपोर्ट के 382वें पाराग्राफ में आयोग ने लिखा भी है, 'आंध्र में माहौल बड़े राज्य के पक्ष में है, जबकि तेलंगाना में लोगों की राय अब भी पृथक राज्य की है। वैसे आंध्र प्रदेश में हुए जनमत संग्रह में शामिल महत्वपूर्ण नेता भी आंध्र में तेलंगाना के विलय को वांछनीय मानने के बावजूद यह मानते हैं कि यह लोगों, खासकर तेलंगाना के लोगों की स्वेच्छा से होना चाहिए।'

इस रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भी आंध्र प्रदेश में तेलंगाना के विलय को लेकर उलझन में डाल दिया था। यह उन्हें 'विस्तारवादी साम्राज्यवाद का ही एक रूप' लग रहा था। उन्होंने इस विलय को शादी का ऐसा बंधन माना, जिसमें अगर सहयोगी आपस में नहीं मिल सकते, तो इसमें 'तलाक के प्रावधान' वाला प्रस्ताव है।
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लेकिन अंततः एक नवंबर, 1956 को आंध्र प्रदेश के रूप में नए राज्य का गठन हुआ, जिसमें तेलंगाना का विलय इस वायदे के साथ किया गया कि सत्ता के बंटवारे में उसे हिस्सा मिलेगा, साथ ही प्रशासनिक अधिवास नियम और विभिन्न क्षेत्रों के खर्च के वितरण में भी उसकी सहभागिता होगी। हालांकि यह हनीमून लंबा नहीं चल सका, क्योंकि तेलंगाना के लोग उस समझौते और वायदे के न लागू होने से नाखुश थे, जो राज्य विलय के वक्त उनसे किया गया था।

वर्ष 1973 में सीमांध्र क्षेत्र में जय आंध्र आंदोलन (जो तेलंगाना को दिए गए सुरक्षात्मक प्रावधान- मुल्की रुल्स यानी स्थानीय लोगों का शासन, के खिलाफ था) के बाद केंद्र सरकार ने जेंटलमैन एग्रीमेंट के प्रावधानों को थोड़ा कमजोर कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे तेलंगाना क्षेत्र में बड़ा जनांदोलन शुरू हो गया। तेलंगाना के इतिहास को देखकर आंध्र प्रदेश के प्रस्तावित बंटवारे को नए राज्य के गठन के बनिस्बत 'पुनर्गठन' कहना कहीं ज्यादा सही होगा।

फिलवक्त, तेलुगु देशम जैसी पार्टियां, जिसके नेता चंद्रबाबू नायडू अनशन पर बैठे हैं और जिन्होंने पूर्व में तेलंगाना के गठन का स्वागत किया था, सिर्फ इसलिए इसका विरोध कर रही हैं, क्योंकि उन्हें संप्रग सरकार द्वारा किए गए इस पुनर्गठन के तरीके से आपत्ति है। दशक भर लंबे अपने शासन के दौरान इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में रखने और यहां तक कि तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) द्वारा यूपीए-एक से समर्थन वापस लेने के बावजूद भी सोया रहने वाला केंद्र जिस तरह लोकसभा चुनाव को देखते हुए अचानक जगा है और राज्य के गठन की आनन-फानन में घोषणा की है, उससे उसके राजनीतिक निहितार्थ की ही बू आती है।

इसकी वजह भी स्पष्ट है। यूपीए-दो के गठन में एकीकृत आंध्र प्रदेश के करिश्माई नेता वाई एस राजशेखर रेड्डी का बड़ा योगदान था। उनके निधन के बाद खिसकी राजनीतिक जमीन तथा उनके पुत्र जगन मोहन रेड्डी का सीमांध्र में मजबूत उदय होने की वजह से कांग्रेस मान रही है कि तेलंगाना का बीजारोपण कर वह खोई सियासी जमीन पा सकती है। नए राज्य में टीआरएस के कांग्रेस में विलय की संभावना को देखते हुए पार्टी रणनीतिकार यह उम्मीद पाले हुए हैं कि चुनाव के बाद जगन भी वापस पार्टी में आ जाएंगे, जिससे पूरे क्षेत्र में कांग्रेस अपना आधार फिर से पाने में सफल होगी।

यहां सबसे ज्यादा घाटा तेलुगू देशम को होता दिख रहा है, जिसने तेलंगाना में अपना आधार खो दिया है और जगन-रथ आने से पहले ही उसका सफाया भी शुरू हो चुका है। लिहाजा चंद्रबाबू नायडू अनशन पर बैठने को बाध्य हुए हैं, जबकि जगन तेलंगाना विरोधी भावनाओं को भुनाकर अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

विवाद की मुख्य जड़ बने हैदराबाद को छोड़ दें, तो ऐसे कई अन्य मुद्दें भी हैं, जिसे इस पुनर्गठन से पहले निपटाना आवश्यक होगा। इन मुद्दों में सरकारी कर्मचारियों की स्थिति तथा पानी और बिजली बंटवारा महत्वपूर्ण है। कोई भी निर्णय लेने से पहले केंद्र सरकार को दोनों पक्षों को विश्वास में लेना होगा, जो विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों में बंटे हैं। यानी, यहां सिर्फ राजनीतिक भाग्य ही दांव पर नहीं लगा है, बल्कि लाखों लोगों का विश्वास भी लगा है। लेकिन दुर्भाग्य ही कहेंगे कि इसे लेकर अब तक कोई स्पष्टता नहीं दिख रही है।

बहरहाल, बड़े राज्य बनाम छोटे राज्य की बहस में न भी पड़ें, तब भी केंद्र को यह विश्वास दिलाना होगा कि प्रशासनिक सुविधा की वजह से ही जमीन का बंटवारा हो रहा है, दिलों का बंटवारा किसी भी कीमत पर नहीं होना चाहिए। आम सहमति और टकराव से दूरी ही वह मूलमंत्र होना चाहिए, जो हमारे देश की एकता और अखंडता का आधार है।
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(लेखक विवेकानंद इंटरनेशल फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं)
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