हमारे राजनेता भले ही लंबी-चौड़ी हांकें, लेकिन कभी न कभी लपेटे में आ ही जाते हैं। अब देखिए न, कल तक लालू भाई भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता के खिलाफ डायलॉग दागा करते थे, आज खुद दागी होकर जेल में लिट्टी तोड़ रहे हैं। उनकी पत्नी ने बुझती लालटेन को जलाए रखने का प्रण ले लिया है। बेटे-बेटी सब राजनीति में आने की बात कर रहे हैं, मानो बिहार और देश को बदल कर ही दम लेंगे। कल तक मसूद साहब पांच रुपये में गरीबों को भर पेट खाना खिला रहे थे, आज खुद मुफ्त की रोटियां खा रहे हैं।
भाजपा भी कौन-सी कम है! कल तक वह जिस अध्यादेश के पक्ष में नहीं थी, उसको कांग्रेस ने वापस क्या करवा दिया, भाजपा को मानो सांप सूंघ गया है। प्रधानमंत्री को वह निशाना बनाए, तो कोई बात नहीं, मनमोहन सिंह को वह कमजोर बताए, तो कोई बात नहीं, लेकिन राहुल गांधी अगर अध्यादेश को बकवास बताकर खारिज करने की बात करें, तो भाजपा को अचानक प्रधानमंत्री की गरिमा की याद आने लगती है।
भई वाह! वह यह नहीं देखती कि उसकी पार्टी के एक तेज-तर्रार नेता ने लौहपुरुष का लोहा किस तरह उतार दिया है। प्रधानमंत्री की मर्यादा की बात करने वालों को पीएम इन वेटिंग की मर्यादा याद नहीं आती! क्या उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अधिकार नहीं है? लेकिन भाजपा ने उनकी वेटिंग सीट कन्फर्म करने के बजाय उनके ही चेले को आगे कर दिया।
नमो का जादू जैसे ही चलने लगा, खुद को जन्मना हिंदू और कर्मकांडी बताने वाला यह शख्स अब सेक्यूलर होने की फुल प्रोसेस में हैं। सुना है कि अब वह कैमरे के सामने टोपी भी पहनने लगे हैं। अब उनकी सभाओं के लिए थोक में बुर्के सिलवाए जा रहे हैं। अब तो वह पहले शौचालय, फिर देवालय की बात भी कर रहे हैं। आखिर वोट का सवाल है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद अब थोड़ी-बहुत धर्मनिरपेक्षता का सुबूत तो देना होगा।
अब राहुल बाबा को ही देख लीजिए। कभी वह दलित और भट्ठा-पारसौल खेला करते थे। आज अपनी ही सरकार द्वारा लाए अध्यादेश को फाड़कर रद्दी की टोकरी में फेंकने की बात करने लगे हैं। उनकी माताजी ने रायबरेली को स्वर्ग बना दिया है, खुद वह अमेठी को जन्नत बना देने की कोशिश में लगे हैं। दूसरी जगह का आदमी भाड़ में जाए। ये लोग भूल जाते हैं कि जनता बेवकूफ नहीं है।