पिछले एक पखवाड़े के दौरान व्यक्तिगत और पेशेगत कारणों से मैं खबरों और घटनाक्रमों पर उस तरह निगाहें नहीं रख पा रहा था, जैसा मैं अमूमन रखता हूं। एक शाम एक अंग्रेजी न्यूज चैनल के, जहां से मैं एक या दो बार ही बुलाया गया हूं, गेस्ट को-ऑर्डिनेटर का फोन आया। उनका कहना था कि वह मालदा की घटना पर एक बहस आयोजित कर रहे हैं, जिसमें क्या मैं आ सकता हूं। जब मैंने कहा कि इस घटना के बारे में मेरी बहुत जानकारी नहीं है, तो उनका जवाब था कि आपके लिए तो यह कोई समस्या होनी ही नहीं चाहिए, क्योंकि आप बंगाली हैं, और हमें पैनल में बंगाल का कोई विशेषज्ञ चाहिए। मेरा जवाब था कि मेरा बचपन उत्तर प्रदेश में बीता है (हालांकि जिस शहर में मैं बड़ा हुआ, वह अब उत्तराखंड में है)। पर मेरे तर्क से वह संतुष्ट नहीं थे। उनकी धारणा यह थी कि मैं बहस में शामिल न होने के लिए ऐसा कह रहा हूं।
उस रात मैं मीडिया के गैरपेशेवराना रवैया देख चकित रह गया-मुझे इसलिए नहीं बुलाया जा रहा था कि मैं पिछले कई दशकों से सांप्रदायिकता पर लिख रहा हूं, बल्कि इस कारण बुलाया जा रहा था कि मैं एक बंगाली हूं! जबकि अपनी मातृभाषा बांग्ला के बजाय हिंदी में राजनीतिक विमर्श करना मेरे लिए ज्यादा सहज है। जब मैं स्कूल में था, तब किसी ने मुझे या दूसरे बंगाली साथियों को सिर्फ बंगाली होने कारण अलग तरीके से नहीं देखा। मैं एक सैन्य छावनी वाले शहर के कैंपस में बड़ा हुआ, जहां हर राज्यों के लोग रहते थे। बंगाल का होने के कारण स्कूल में हमें कोई अलग तरीके से नहीं देखता था। लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत में एक टेलीविजन चैनल ने मुझे मालदा पर बोलने के लिए इसलिए आमंत्रित किया, क्योंकि मैं बंगाली हूं। कौन कह सकता है कि हमने तरक्की नहीं की है!
दो दिन बाद ऐसी ही स्थिति से फिर मेरा सामना हुआ-इस बार दूसरे चैनल से ममता बनर्जी के बयान पर मुझसे टिप्पणी मांगी गई। मैंने कहा कि मैं बाहर कुछ दोस्तों के साथ हूं, और मुझे पता नहीं कि ममता बनर्जी ने क्या कहा है। चैनल के गेस्ट को-ऑर्डिनेटर का जवाब था, ममता ने कहा है कि मालदा की घटना सांप्रदायिक नहीं है, न ही सरकार ने मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया है।
इससे पहले कि मैं कुछ प्रतिक्रिया करता, उन्होंने पूछा कि आप ममता बनर्जी का समर्थन करेंगे या विरोध? मैंने जवाब दिया कि लंबे समय से सांप्रदायिक दंगों और धार्मिक विवादों की रिपोर्टिंग करने के कारण मैं इस मुद्दे को स्याह-सफेद ढंग से नहीं देखता। हमारे समाज में सांप्रदायिकता जिस तरह समय-समय पर दिखती है, उसे देखते हुए इस पर हां या न में जवाब नहीं दिया जा सकता। मालदा की घटना को उसके बाद के घटनाक्रमों से, खासकर भाजपा समेत दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने इसका जिस तरह लाभ उठाया है, अलग करके नहीं देखा जा सकता। मेरे जवाब से गेस्ट को-ऑर्डिनेटर संतुष्ट नहीं था-उसकी जिज्ञासा थी कि मैं ममता समर्थक हूं या विरोधी? बहुत कमजोर आवाज में उसने कहा, अपने बॉस से बात कर, जो एक चर्चित टेलीविजन एंकर हैं और हर शाम अपनी बेहद आक्रामक एंकरिंग के लिए जाने जाते हैं, मैं दोबारा आपसे संपर्क करता हूं। मैं आश्वस्त था कि कम से कम आज शाम तो दोबारा उनका टेलीफोन नहीं आने वाला।
कई दिनों तक सोशल मीडिया और तथाकथित स्वयंभू मोदी भक्तों ने (जो प्रधानमंत्री का भला करने के बजाय उनका नुकसान ही ज्यादा करते हैं) मुख्यधारा के राष्ट्रीय मीडिया के खिलाफ अभियान चलाया। उनका तर्क था कि दादरी की घटना के बाद राष्ट्रीय मीडिया आक्रामक हो गया था, पर मालदा पर मीडिया में वैसी सुगबुगाहट नहीं दिखाई पड़ी। जबकि मालदा की घटना पर मीडिया चुप नहीं था, न ही दादरी और मालदा की तुलना की जा सकती है। दादरी में भीड़ ने एक खास परिवार को निशाना बनाया था, जबकि मालदा में जनसमूह के निशाने पर पुलिस थाना और सरकारी विभाग थे। उस तोड़फोड़ में कुछ लोग घायल हुए, पर सांप्रदायिक पहचान के आधार पर उन्हें निशाना नहीं बनाया गया था। इसलिए मालदा की हिंसा को सांप्रदायिक घटना कहना या दादरी से तुलना करना गलत होगा।
लेकिन यह सब कहने का मतलब यह नहीं है कि पश्चिम बंगाल की सरकार सही थी। क्या स्थानीय प्रशासन को एक ऐसी जगह में लोगों का इतना बड़ा जमावड़ा होने देना चाहिए था, जहां राजनीति और अपराध का चोली-दामन का संबंध है? कोई कह सकता है कि मालदा की यह प्रतिक्रिया उत्तर प्रदेश के राजनेताओं की विवादास्पद टिप्पणियों के कारण हुई। लेकिन इस मामले में कानून तो अपना काम कर चुका था, कमलेश तिवारी को गिरफ्तार कर लिया गया था। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा दिन नहीं रह गए हैं, ऐसे में ममता बनर्जी ने एक अचर्चित मुस्लिम संगठन के विरोध प्रदर्शन को जान-बूझकर मंजूरी दी। यह कदम इसलिए उठाया गया, ताकि मुस्लिम मतदाता आगामी चुनाव में कांग्रेस या वाम मोर्चे के बजाय तृणमूल को वोट दें। दुर्योग से अब पश्चिम बंगाल और असम में चुनावी माहौल सांप्रदायिक रूप से इतना ध्रुवीकृत हो गया है कि अगर तृणमूल मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन लेती है, तो भाजपा हिंदू मतदाताओं के ध्रुवीकरण की तमाम कोशिश करेगी। वैसी परिस्थिति में, धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करने वाले लोगों और पार्टियों को इसका ध्यान रखना होगा कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति किसी भी तरह सफल न हो पाए। हिंदुत्व ब्रिगेड की आलोचना जितनी जरूरी है, मुस्लिम हितों की बात कर उन्हें एकजुट करने की कोशिशों को भी वैसा ही करारा जवाब देना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही भारत के धर्मनिरपेक्ष तंतु के लिए खतरनाक हैं।
वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक