महज दो महीने पहले हमने देखा कि सड़क दुर्घटना के एक पुराने मामले में किस-किस तरह की कवायदें की गईं, ताकि सुपरस्टार सलमान खान को एक भी रात सलाखों के पीछे न गुजारनी पड़े। हाल के दिनों में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिनसे ऐसा आभास होता है कि ऊंची पहुंच रखने वाली शख्सियतों के साथ किस तरह का खास सुलूक होता है, भले ही इन घटनाओं में उनका सीधा हाथ या जिम्मेदारी न हो।
सबसे पहले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर एयर इंडिया की मुंबई-न्यूयॉर्क फ्लाइट लेट कराने का आरोप लगा। हालांकि फडणवीस अभी न्यूयॉर्क से लौटे नहीं हैं, लेकिन यह मामला सामने आने के बाद उन्होंने न सिर्फ खुद को निर्दोष बताया था, बल्कि लौटने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी थी। बताते हैं कि इस मामले की जांच में फडणवीस और एयर इंडिया के बजाय तत्कालीन परिस्थितियों को विमान में विलंब के लिए ज्यादा जिम्मेदार पाया गया है। दोषी कोई हो या न हो, लेकिन इस घटना से यह धारणा तो बनी ही कि मुख्यमंत्री और उनके सचिव के कारण विमान विलंबित हुआ।
वह मामला सुलझा ही था कि केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू का मामला सामने आ गया। यह बताया गया कि एयर इंडिया ने कुछ यात्रियों को उतार दिया, क्योंकि विलंब से पहुंचे रिजिजू को लेह से उस विमान में सवार होना था। हालांकि रिजिजू ने इस मामले में माफी मांगी है, और बताया है कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं थी। उधर विमानन मंत्रालय ने भी उन्हें क्लीन चिट दे दी है। बताया जा रहा है कि इस मामले में गलती एयर इंडिया की है। लेकिन वीवीआईपी का मामला होने से लगता यही है कि हो न हो, इस पूरे मामले में रिजिजू जिम्मेदार होंगे।
सड़क दुर्घटनाओं के लिए शायद ही कभी किसी को जिम्मेदार ठहराया जाता हो। लेकिन दुर्घटना के बाद लोगों से जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा की जाती है, ताकि घायलों को तत्काल न सिर्फ अस्पताल ले जाया जा सके, बल्कि उनकी बेहतर चिकित्सा भी संभव हो सके। दौसा और जयपुर के बीच हाइवे पर दो कारें टकरा गईं, जिनमें से एक में हेमा मालिनी थीं। हेमा मालिनी समेत सभी घायलों को इलाज के लिए ले जाया गया। लेकिन जहां हेमा मालिनी को गाड़ी से दूसरे अस्पताल में ले जाया गया, वहीं बुरी तरह घायल दो साल की बच्ची समेत दूसरे घायलों को नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उस बच्ची की बाद में मौत हो गई।
उस बच्ची के माता-पिता का कहना था कि अगर उसे भी उसी वक्त इलाज और मदद मिलती या उसे भी हेमा मालिनी के साथ उसी गाड़ी में उसी अस्पताल में ले जाया जाता, तो वह जिंदा होती। मैं यह नहीं कह रहा कि हेमा मालिनी ने व्यक्तिगत तौर पर यह फैसला लिया होगा कि उस बच्ची और दूसरे घायलों को उनके साथ इलाज के लिए न भेजा जाए। बल्कि मुंबई लौटने के बाद उन्होंने उस पीड़ित परिवार की आर्थिक सहायता की घोषणा कर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया ही है। लेकिन इस संवेदनशीलता का परिचय वह उस दुर्घटना के तत्काल बाद भी दे सकती थीं। अगर उनके साथ ही उस छोटी बच्ची का भी तत्काल इलाज शुरू हो गया होता, तो यह मामला इतना बढ़ता ही नहीं। लेकिन चूंकि ऐसा नहीं हुआ, इसलिए हेमा मालिनी मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक के निशाने पर आ गईं। यह कहा जाने लगा कि फिल्म से जुड़ी शख्सियतों को सिर्फ उनके ग्लैमर के कारण राजनीति में लाया जाता है। हालांकि इस मामले में सिर्फ भाजपा को दोष नहीं दिया जा सकता। तमाम राजनीतिक पार्टियां ग्लैमर की दुनिया से जुड़ी शख्सियतों को उनकी राजनीतिक क्षमता के लिए नहीं, बल्कि चकाचौंध भरे उनके आभामंडल और उनकी लोकप्रियता के लिए जोड़ती हैं।
अगर हम यह मान भी लें कि इन तीन घटनाओं में संबंधित राजनेताओं की कोई सीधी भूमिका नहीं रही है, तो भी इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि हमारे यहां रसूख वाले लोगों के साथ खास तरह का सुलूक किया जाता है। वीआईपी कल्चर भला और क्या है? जहां यह सच है कि सरकार से जुड़े लोग नियम तोड़कर सुविधा हासिल करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करते हैं, वहीं यह भी सच है कि आम लोग खुद खास बनने की कोशिश करते हैं, क्योंकि यह उन्हें अधिक सुविधाएं हासिल करने की गारंटी देती है।
हम भारतीय दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गर्व करते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल सिर्फ चुनाव के वक्त ही किया जाए। लोकतंत्र में सबको बराबरी का अधिकार मिला हुआ है, तो वह हर मौके पर दिखना भी चाहिए। जब विमान के एक सामान्य यात्री के लिए विमान विलंब नहीं कर सकता, तो खास लोगों के लिए भी यही नियम होना चाहिए। इसी तरह जब आम लोगों के लिए विशिष्ट लोगों को असुविधा में नहीं डाला जा सकता, तो खास लोगों के लिए आम आदमी को परेशान क्यों करना चाहिए? हेमा मालिनी का मामला थोड़ा अलग है। वह सिर्फ एक सांसद नहीं, रूपहले पर्दे की नायिका भी हैं, जिनसे आदमी संवेदनशीलता की स्वाभाविक ही उम्मीद करता है। लिहाजा आपात स्थितियों में ऐसी शख्सियतों का आचरण ऐसा होना चाहिए, जो लोगों को प्रेरित करे।
पिछले साल लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने सिर्फ सरकार बदलने के लिए वोट नहीं डाले थे, बल्कि लोगों के नजरिये और व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के लिए भी वोट डाले थे। लोगों ने इस उम्मीद के साथ सत्ता परिवर्तन किया कि लोकतंत्र बिल्कुल बुनियादी स्तर पर दिखने लगेगा। पर जाहिर है, वास्तविक बदलाव तो तभी होगा, जब लोगों का नजरिया बदलेगा और लोगों को आम और खास की तरह नहीं देखा जाएगा।
-वरिष्ठ पत्रकार, और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक