कठुआ और उन्नाव की घटनाओं के बाद यह मांग उठी कि बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों को फांसी की सजा मिलनी चाहिए। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल सरकार से यह मांग मनवाने के लिए भूख हड़ताल पर बैठ गईं और जब सरकार ने इसे मान लिया ,तो उन्होंने कहा कि यह निर्भयाओं की जीत है। लेकिन क्या वाकई! हकीकत यह है कि जब से सरकार ने फांसी की मांग मानी है, तब से ही न जाने कितनी बच्चियों के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हो चुकीं।
इंदौर में तो एक आदमी ने मां के साथ सोई बच्ची को उठाया और दूर ले जाकर वारदात को अंजाम दिया। उन दिनों यह लेखिका इंदौर में ही थी। वहां औरतों ने नारे लगाए कि इस आदमी का खून उन्हें चाहिए। कई बार ऐसा भी महसूस होता है कि न्याय की सारी मांगें भीड़तंत्र के हवाले कर दी गई हैं। इसके अलावा जब भी कोई गंभीर घटना होती है, तब पहले से अधिक कठोर कानून की मांग की जाती है। कहा जाता है कि कानून ऐसा हो कि लोग डरें और अपराध न करें।
पर अपराधी जब अपराध करता है, तो वह नहीं सोचता कि बाद में क्या होगा। फिर अपने देश में कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि अक्सर अपराधी कभी गवाहों के मुकरने तथा कभी साक्ष्यों के अभाव में छूट जाते हैं। निर्भया के समय जब नया दुष्कर्म कानून बना था, तब यही चिंता व्यक्त की गई थी कि कहीं ऐसा न हो कि अपराधी अपराध करने के बाद जान लेने लगें। और पिछले दिनों की घटनाएं बता रही हैं कि छोटी बच्चियों को अपराधी जान से मार रहे हैं।
ऐसा क्यों है कि दुष्कर्म पर जितनी बहसें हुई हैं, उनसे अपराधी डरने के मुकाबले और अधिक हौसलामंद हुए हैं? यही नहीं, छोटे-छोटे बच्चे इस तरह के अपराधों में शामिल हो रहे हैं। ओडिश में एक पांच साल की बच्ची के साथ ग्यारह और तेरह साल के दो बच्चों ने दुष्कर्म किया। इससे पहले मुंबई में भी ऐसा हो चुका है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े देखें, तो इन दिनों बड़ी संख्या में किशोर और कम उम्र के बच्चे गंभीर अपराधों में लिप्त हो रहे हैं। ये तो कानून की बारीकियां भी नहीं जानते। लोग भूल जाते हैं कि कानून का डर बैठाने से अपराध नहीं रुक जाते। यदि ऐसा होता, तो अपने देश में दहेज का तो अभी तक खात्मा ही हो गया होता। मगर जैसे-जैसे उपभोक्ता बाजार बढ़ा है, दहेज सुरसा की तरह फैल गया है।
दुष्कर्म की भयानकता को भी रोजमर्रा के हो-हल्ले ने ऐसा बना दिया है कि आकर्षित होकर बच्चे ही बच्चों के प्रति अपराध कर रहे हैं। बच्चे इस तरह की घटनाओं में क्यों शामिल हो रहे हैं, यह सोचने की बात है।
सच तो यह है कि लड़कियां जहां पैदा होती हैं, उनके प्रति अपराधों के बीज वहीं से पड़ जाते हैं। उनका पैदा होना एक अपराध है। जिस घर में वे पलती-बढ़ती हैं, वहीं उन्हें न जाने कितने प्रकार के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। लड़कियों के प्रति अपराध न हों, इसके लिए जरूरी तो यही है कि बचपन से लड़कों को यह शिक्षा दी जाए कि लड़कियां होने का मतलब कमजोर होना नहीं है।
न ही वे इसलिए हैं कि लड़की होने के कारण शिकार बनती रहें। यौन हिंसा के खिलाफ कानून बनें, मगर उनका क्रियान्वन हो । और सबसे बड़ी जरूरत तो यह है कि सामाजिक विकास में लड़कियों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया जाए। उन्हें अपने मायके में बराबर का हक दिया जाए। सोच का बदलाव ही लड़कियों को हर तरह के अपराध और हमलों से बचा सकता है।