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दोष न्याय व्यवस्था का नहीं

Tue, 12 Feb 2013 12:12 AM IST
केटीएस तुलसी
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एक तरफ अफजल गुरु की फांसी पर देर आए दुरस्त आए की बात हो रही है, तो वहीं यह भी कहा जा रहा है कि आखिर निर्णय लेने में इतनी देर क्यों। अगर किसी मुकदमे में दस साल लग जाते हैं और सुनवाई रुकी हुई हो, तो इसे संविधान के खिलाफ मानना चाहिए। किसी भी इंसान को मौत के लिए इतना इंतजार नहीं करा सकते। यह एक तरह से मानवीय क्रूरता है। लिहाजा यहां बात अफजल के आतंक की नहीं, एक कानूनी प्रक्रिया की है।
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भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अफजल को हर वह सुविधा मिली, जो एक मुजरिम को मिलती है। जहां भी उसके मुकदमे चले, उसे वकील मिले। सुप्रीम कोर्ट ने समय रहते अपना फैसला सुनाया। इसके आगे सारे निर्णय राजनीतिक होते हैं। बेशक घटनास्थल पर न पकड़े जाने, किसी की हत्या न करने और केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर किसी अपराधी को आम तौर पर मृत्यदुंड की सजा नहीं सुनाई जाती है, लेकिन यहां आतंक का चरम था और अफजल की मदद लेकर ही आतंकियों ने हमारे लोकतंत्र के सर्वोच्च प्रतीक पर हमला किया था।

इसलिए न्यायिक व्यवस्था ने इसकी अपने ढंग से समीक्षा की। जहां तक माफी की बात है, तो अमूमन कोई भी राष्ट्रपति सरकार की मंशा भांपकर ही दया याचिकाओं पर फैसला सुनाते हैं। अगर दया याचिका पर वर्षों तक निर्णय नहीं होता, तो सरकार की नीयत को भी जिम्मेदार माना जाता है। इससे स्वाभाविक तौर पर सरकार के खिलाफ अविश्वास पनपता है। अफजल मामले में यही हुआ है। इसलिए यहां मामला न्याय व्यवस्था का नहीं, राजनीतिक अपरिपक्वता का है।
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