पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकारवादी मेनका गांधी ने ढाका (बांग्लादेश) के मेयर को चिट्ठी लिखकर उनसे गलियों के कुत्तों को मारने का अभियान बंद करने का अनुरोध किया है। मेनका गांधी की इस पहल के लिए मैं उनका शुक्रिया अदा करती हूं। बांग्लादेश में कुछ दिन पहले कुत्तों को मारने की मांग के साथ स्थानीय नागरिकों ने मानव श्रृंखला बनाई थी।
वहां स्थानीय प्रशासन तो आवारा कुत्तों को मार ही रहा है, व्यक्तिगत स्तर पर भी मोहल्लों में लोग कुत्ता मारने के अभियान में लगे हैं। कभी-कभी मैं सोचती हूं कि क्रूरता के किस चरम पर पहुंचने के बाद मनुष्य बगैर सोचे-विचारे असहाय प्राणियों की हत्या करने लगता है। एक देश कितना सभ्य है, इसका पता इससे भी चलता है कि वहां बेजुबान जीव कितने सुरक्षित हैं। जो देश कुत्ते-बिल्लियों की हत्या करता है, वह सिर्फ असभ्य ही नहीं, निर्मम भी है।
जंगल की भेड़िया प्रजाति से कुत्ते की उत्पत्ति हुई। नस्लीय रूप से कुत्ते सियार से भी मिलते-जुलते हैं। लगभग बारह हजार साल से कुत्ते मनुष्य के साथ रहते हैं। कुत्तों का काम था दूर-दराज के रास्तों में राहगीरों के साथ चलना, उन्हें सुरक्षा प्रदान करना और शिकारियों को शिकार में मदद करना। पर कुत्ते क्या सिर्फ राहगीरों और शिकारियों की मदद करते थे?
वे वस्तुतः सभी के काम आते थे। भेड़ों के रेवड़ को चरने ले जाना, गायों के झुंड को सुरक्षा प्रदान करना, बर्फ के देश में स्लेज गाड़ी चलाना, बोझ ढोना-ये काम कुत्ते करते थे, आज भी करते हैं। प्राचीन मिस्र में तो कुत्ते-बिल्लियों को ईश्वर का दर्जा दिया गया था। खेतों में फैले चूहों को मारकर बिल्लियों ने कभी मिस्र वासियों को अकाल से बचाया था।
उत्तर अमेरिका और यूरोप के लोग आज भी कुत्ते-बिल्लियों से प्यार करते हैं, उन्हें शरण देते हैं। दूसरी ओर, अविकसित देशों में कुत्ते-बिल्लियों को भोजन के रूप में, आफत के तौर पर या चोरों को भगाने के मददगार के तौर पर देखा जाता है। अनेक देशों में नापाक प्राणी के तौर पर कुत्ते घृणा के पात्र हैं। एशियाई देशों के अमीर लोग विदेशी नस्ल के कुत्ते पालते हैं। जबकि देसी कुत्ते रास्तों में भटकते फिरते हैं।
लोग इन्हें खाने को नहीं देते, शरण भी नहीं देते। मजबूरी में ये डस्टबिन से जो सड़ा-गला मिल जाता है, वही खाते हैं, अन्यथा भूखे ही रह जाते हैं। मार-मारकर कुत्तों के पैर तोड़ देना, उन्हें पीटकर मार डालना, जहर देकर मार डालना-असभ्य समाज में कुत्तों के साथ इस तरह का व्यवहार हमेशा ही होता आया है। गलियों में घूमते फुर्तीले कुत्तों की हत्या कर सुबह-सुबह ट्रक में भरते हुए मैंने खुद देखा है।
कुत्ते के काटने से रैबीज हो सकता है। पर इसका हल कुत्तों को मार डालना तो नहीं है। इसका समाधान है कुत्तों को रैबीज का टीका लगाना। मनुष्य अगर चाह ले, तो क्या थोड़ा उदार नहीं हो सकता? मैं तो मानती हूं कि सड़कों पर घूमते कुत्तों को घर ले जाकर पालना चाहिए। ऐसा नहीं होता, तो आवारा कुत्तों के बंध्याकरण की व्यवस्था हो। अलग-अलग मोहल्लों में कुत्तों के आश्रय स्थल हों, जहां उनके सोने-खाने की व्यवस्था हो।
मैं बिल्ली पालती हूं। इसे मैंने नस्ल देखकर नहीं खरीदा। यह देसी बिल्ली है। कोलकाता के एक मछली बाजार से मैं इसे उठाकर ले आई थी। मेरी इस बिल्ली की उम्र सत्रह साल है। मनुष्य की उम्र के लिहाज से विचार करें, तो यह अस्सी साल की है। देसी बिल्लियां सत्रह साल तक जिंदा नहीं रहतीं। मनुष्य के हाथों मार खाकर, बीमारी, भूख और दुर्घटनाओं से वे कम उम्र में ही मर जाती हैं।
पर अच्छे भोजन और घर में मिली सुरक्षा के कारण मेरी बिल्ली जिंदा है। मेरी बिल्ली चतुर भी बहुत है। दुनिया के लगभग हर देशों की, हर नस्ल की बिल्लियां मैंने देखी हैं। सियामिस नस्ल की बिल्लियों को सबसे चतुर माना जाता है। पर अपनी बिल्ली जैसी तेज दिमाग वाली बिल्ली नहीं देखी। मेरी इस बिल्ली का फुटबॉल शो टीवी पर दिखाया जा चुका है। इस बिल्ली को लेकर फिल्म भी बन चुकी है, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है।
सिर्फ बिल्ली नहीं, कुत्ते भी तीक्ष्ण बुद्धि वाले होते हैं। इसी कारण प्रतिकूल परिस्थिति में वे आज भी अपना अस्तित्व बचाए हुए हैं। यह सोच गलत है कि देसी कुत्ते पाले नहीं जा सकते। भारत और बांग्लादेश की सड़कों से उठाकर ले जाए गए कुत्ते के बच्चों को मैंने अमेरिकी घरों में पलते देखा है।
कई अमेरिकी घरों में मैंने इन देसी कुत्तों को सोफे पर बादशाह की तरह आराम फरमाते देखा है। मैंने कुत्ते कभी नहीं पाले, लेकिन जीवित रही, तो देसी कुत्ते का एक बच्चा जरूर पालूंगी। प्यार और शरण मिले, तो देसी कुत्ते भी जर्मन शेफर्ड को टक्कर दे सकते हैं। भोजन, सुरक्षा और आराम मिलने पर गलियों के लावारिस जानवर भी सुंदर, स्वस्थ और वफादार हो उठते हैं।
कुत्तों की वफादारी की तो खैर कोई तुलना ही नहीं है। यूरोप-अमेरिका में मैंने बहुत बार बेघर लोगों को कुत्तों के साथ सड़कों पर लेटे देखा है। कुत्ते कितने भी भूखे क्यों न हो, अपने भिखारी दोस्तों को वे छोड़कर नहीं जाते। कुत्तों को साथ लेकर सड़कों पर बैठने से भिखारियों को मदद भी बहुत मिलती है।
मैं कुत्ते नहीं पालती। लेकिन बाहर निकलने पर अपनी गाड़ी में कुत्तों के लिए खाने-पीने की चीजें हमेशा रखती हूं। रास्ते की बिल्लियों को खाना खिलाने के लिए मैंने डे केयर सेंटर खोल रखा है। भूखे कुत्ते-बिल्लियों को खिलाकर मुझे शांति मिलती है। अपने जीवन में असंख्य मजबूर और भूखे कुत्ते-बिल्लियों के साथ मेरा जो रिश्ता बना है, अनेक लोगों के साथ बने रिश्तों की तुलना में उसका मोल ज्यादा है।
इसके पीछे मेरा कोई राजनीतिक, वाणिज्यिक या साहित्यिक स्वार्थ नहीं है। नि: स्वार्थ काम में एक सौंदर्य होता है, जिसे सभी देख-समझ नहीं पाते। बहुत लोग मुझे कहते हैं कि मैं गलियों के कुत्ते-बिल्लियों को खिलाती हूं, लेकिन भूखे लोगों का पेट नहीं भरती।
हालांकि यह बात पूरी तरह सच नहीं है, लेकिन यह जरूर सच है कि भूखे लोगों की तुलना में भूखे जानवरों की पीड़ा मुझे ज्यादा द्रवित करती है। इसकी वजह यह है कि भूखे लोगों की सेवा के लिए तो अनेक संस्थाएं हैं, लेकिन बेजुबान प्राणियों की पीड़ा कम ही लोग समझते हैं।