बा-अदब बा-मुलाहिजा होशियार, शहंशाह पधार रहे हैं!! राजशाही और मुगल बादशाही के दौरान शासक के प्रवेश की शान में इस तरीके के घोष हुआ करते थे, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान ‘मी लॉर्ड’ सरीखे संबोधनों में तब्दील हो गए। कल्पना तो यह थी कि स्वतंत्रता के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम होने पर जनसेवक या लोकसेवक प्रशासन की बागड़ोर संभालेंगे, किंतु आजादी के 79 वर्षों में प्रशासन और जनता के बीच की दूरी ने खाई का रूप ले लिया। अब शासन व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा अहंकारपूर्ण नजर आने लगी है।
वर्तमान में कमरे में बैठे शासक तक आम जनता की पहुंच पहले से कहीं मुश्किल हो गई है। भले ही राजपथ और राजभवन के नाम बदलकर क्रमशः कर्तव्य पथ और लोकभवन कर दिए गए हों, लेकिन नौकरशाही में जनता दरबार और जनसुनवाई की व्यवस्था बदस्तूर जारी है। राजनीतिक नेतृत्व ने अपनी छवि और सोच बदलने के लिए कई पहल की हैं, लेकिन अफसरशाही तो निरंतर सर्वशक्तिमान शासक की छवि को चमकाने में लगी रहती है। वास्तविकता यह है कि अफसरों की इच्छा या सहमति के बिना कुछ भी धरातल पर नहीं आ सकता।
बीते दिनों केंद्रीय शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र के बाद आंदोलन खत्म हो गया, लेकिन बहुत से अनुत्तरित प्रश्नों को यथावत छोड़ गया। सबसे अहम मुद्दा तो यह है कि संविधान के अनुसार संपूर्ण शासन व्यवस्था को विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका में विभाजित किया गया था। यह विभाजन शनैः शनैः शिथिल होता गया और इन अंगों ने एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र में न सिर्फ दखलंदाजी की, बल्कि अतिक्रमण कर अपने को गौरवान्वित महसूस करना शुरू कर दिया। आंदोलनों के निशाने पर अक्सर विधायिका के चुने हुए प्रतिनिधि ही रहते हैं, जबकि किसी भी क्रियान्वयन के लिए मौलिक रूप से कार्यपालिका को ही उत्तरदायी होना चाहिए। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान अफसरशाही के दमन का डीएनए शायद अब भी हमारे रक्त से अलग नहीं हो पाया है। इसी कारण आम नागरिक अब भी अफसरशाही के व्यवहार और कार्यपद्धति पर प्रश्न उठाने में डरता है। अन्यथा क्रियान्वयन की खामी हेतु कार्यपालिका को ही दोषी करार दिया जाना चाहिए।
हकीकत यह है कि शासन की प्रायः समस्त व्यवस्थाओं पर नौकरशाही ने अजगरी बंधन कायम कर रखा है और दिखावटी रूप में निर्वाचित प्रतिनिधियों को सामने खड़ा कर दिया जाता है। आजादी के बाद लालफीताशाही में इजाफा ही हुआ है, विशेष तौर पर पिछड़े, आदिवासी या अल्प विकसित राज्यों में तो हर कमरे में हाकिम बैठने लगे हैं। जनता से दूरी तो इस कदर है कि उनकी छाया भी नहीं पड़नी चाहिए। अनेक जिलों में विकास संबंधी कई कमेटियों का दायित्व संभालने वाले कलेक्टर अपने आने--जाने हेतु राजाओं की तरह ही अलग दरवाजा रखते हैं, ताकि मात्र चुनिंदा लोगों से ही संपर्क कायम हो सके।
लोकतंत्र में नीतियां बनाने की जिम्मेदारी विधायिका की होती है, लेकिन नौकरशाही का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि कई अधिकारी रिटायर होने के बाद भी गैर-सरकारी पदों पर रहकर सत्ता के केंद्र में बने रहते हैं। दुर्भाग्यवश, वर्तमान राजनीतिज्ञ भी यह मान बैठे हैं कि शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए अफसर ही उपयुक्त हैं। मान लिया जाए कि यह धारणा सही भी है, तो फिर प्रशासनिक विफलताओं या जन कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में दोष हेतु वे जिम्मेदार क्यों नहीं हैं? पर, सॉफ्ट टारगेट होने एवं अफसरशाही की कुटिल रणनीति के चलते संपूर्ण विफलताओं एवं दोषों हेतु राजनीतिज्ञों को ही दोषी ठहरा दिया जाता है। ब्रिटिश औपनिवेशिक विरासत से उपजी नौकरशाही ने अपने रंग-ढंग में परिवर्तन किए बिना सत्ता पर सर्वाधिकार कायम कर लिया।
जिस प्रकार तत्कालीन अफसरशाही ने जनता के मन में राजशाही और जनता के नुमाइंदों को अविवेकपूर्ण, अनैतिक और अय्याश साबित करते हुए उनके प्रति जहर भरने का काम किया, वही पद्धति अपनाते हुए वर्तमान अफसर भी बिना अवसर चूके राजनीतिक नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। कभी भी यह प्रश्न नहीं उठता कि राजनीतिक नेतृत्व तो पांच साल के लिए चुनकर आता है, जबकि नौकरशाही अपने संपूर्ण कार्यकाल में यथावत बनी रहती है। चुने हुए प्रतिनिधियों का जनता से मिलना मजबूरी है, किंतु जनता की कर अदायगी से तनख्वाह, गाड़ी, आवास, टेलीफोन आदि अनेक सुविधाओं का उपभोग करने वाले व्यक्ति सदैव व्यस्त ही रहते हैं। उनका आमजन की पीड़ा से सरोकार लगभग नगण्य ही रहता है। यदि नेता न मिलें, तो कोपभाजन का शिकार होना पड़ता है, लेकिन नौकरशाही में बैठे अफसरों का कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता।