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विवाद: चीन तो चीन ही है, स्थायी समाधान के लिए जरूरी है अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण

शिवदान सिंह
Updated Thu, 11 Jul 2024 11:57 PM IST

सार

1958 में पं. नेहरू ने सेना के लिए संसाधनों की मांग को उस पंचशील समझौते की आड़ में ठुकरा दिया, जिसे चीन ने कभी नहीं माना।
 
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भारत और चीन के विदेश मंत्री। - फोटो : ANI


इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश पढ़ा गया, जिसमें कहा गया कि सभी देशों को एक-दूसरे के क्षेत्र की संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए। उनका इशारा चीन की तरफ था, जिसने 1955 से भारत का पूरा अक्साई चिन क्षेत्र अपने कब्जे में ले रखा है। भारत और चीन के बीच हुए 2010 के समझौते में साफ लिखा है कि दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता का आदर करेंगे, लेकिन चीन की करनी और कथनी में बहुत अंतर है। एस. जयशंकर ने भारत-चीन सीमा विवाद सुलझाने को अपनी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा है।


भारत और चीन के बीच तनाव का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण नहीं होना है। 1916 में सीमा निर्धारण के लिए ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के बीच एक बैठक शिमला में हुई थी। भारत और तिब्बत के बीच सीमा निर्धारण हो गया था, जिसे मैकमोहन रेखा का नाम दिया गया था। हालांकि चीन सीमा निर्धारण पर सहमत नहीं हुआ था, उसने भारत-तिब्बत सीमा को भी अब तक मान्यता नहीं दी है। इसी कारण लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक सीमा को चीन विवादित मानता है। चीन के साथ विवाद सुलझाने के लिए जयशंकर को अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल परनाइक, जो सेना की उत्तरी कमान के जीओओ सीएनसी रह चुके हैं, के विचारों पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने हाल ही में कहा था कि चीन के साथ भारत के सीमा संबंधी समझौतों में समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलाव की जरूरत है। अन्यथा चीन बार-बार सीमा उल्लंघन करता रहेगा और गलवान जैसी झड़पें होती रहेंगी।


चीन 1951 से ही भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर रहा है। 1951 में तिब्बत पर कब्जा करने के बाद चीन ने एक सड़क जी-21 का निर्माण किया। इसका काफी हिस्सा लद्दाख के अक्साई चिन से होकर गुजरता है। इसकी सूचना भारत सरकार को 1954 में मिल गई थी, लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। इसके बाद भी 1954 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने चीन के साथ पंचशील समझौता किया, जिसका नारा था हिंदी चीनी भाई-भाई। भारत सरकार इस समझौते का पालन करती रही, लेकिन चीन ने इसे कभी नहीं माना। 1962 में चीन ने अचानक भारत पर हमला कर दिया, जिसके कारण चीन की सेना अक्साई चिन से आगे भारतीय क्षेत्र में आ गई। चीनी घुसपैठ को देखते हुए 1958 में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल थिमैया ने पं. नेहरू से सेना की तैयारी के लिए संसाधनों की मांग की, जिसे उन्होंने पंचशील समझौते की आड़ में ठुकरा दिया। देश की रक्षा के प्रति नेहरू के इस रवैये को देखते हुए जनरल थिमैया ने इस्तीफा दे दिया था। फिर चीन ने 1967 में सिक्किम पर कब्जा करने के लिए नाथुला पर हमला कर दिया, लेकिन उस समय मेजर जनरल संगत सिंह ने अदम्य साहस से चीनियों को पीछे धकेल दिया। हालांकि इसके लिए उन्हें दिल्ली से सहमति नहीं मिली थी।


वर्ष 1996 में सीमा पर शांति के लिए दोनों देशों के बीच समझौता हुआ कि सैनिक सीमाओं के बीच में नोमैंस लैंड पर बिना हथियारों के रहेंगे, लेकिन चीन ने इस समझौते की शर्तों को नकारते हुए गलवान में भारतीय सैनिकों पर कंटीले तार लगे हुए लाठी-डंडों से हमला किया। पड़ोसी के साथ शांति पूर्वक रहने के सिद्धांत को धता बताकर चीन ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों-मणिपुर, नगालैंड इत्यादि में आतंकवादी संगठनों को तैयार किया। हालांकि सेना ने उनका सफाया कर दिया। चीन की नजर अरुणाचल प्रदेश पर है। यदि चीन के साथ स्थायी शांति स्थापित करनी है, तो सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण करना होगा। संयुक्त राष्ट्र को भी सीमा निर्धारण की बातचीत में सम्मिलित किया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय सीमा का निर्धारण नहीं होने तक दक्षिण एशिया की इन दोनों शक्तियों के बीच में शांति स्थापित नहीं हो सकती।

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