हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशास्रों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जो बताते हैं कि आंखों की दृष्टि कभी विवेक-दृष्टि से बड़ी नहीं हो सकती। विवेकहीन मनुष्य इहलोक में हमेशा बुरा अंत पाता है, जबकि विवेकी मानव देश-दुनिया में सम्मान पाता है। विवेकी मनुष्य की महत्ता हमेशा कायम रहती है।
एक संत एक दिन धर्मप्रचारार्थ कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक युवक किसी युवती को घूर-घूर कर देख रहा है। देखते ही देखते वह छेड़खानी पर उतर आया। संत वहीं रुक गए। युवक को समझाते हुए कहा, किसी भी युवती के साथ ऐसा व्यवहार करना अशोभनीय और पाप-कर्म है।
उन्होंने युवक के चेहरे पर और ध्यान से दृष्टि गड़ाई, तो उन्हें याद आया कि यह तो वही युवक है, जिसे उन्होंने आंखों के अंधेपन से मुक्ति दिलाई थी।
संत जी को अपनी ओर निहारते देखकर युवक भी उन्हें पहचान गया। युवक उनके चरणों में गिरकर बोला, महाराज, मैं वही हूं, जिसे आपने आंखों की ज्योति दिलाई थी। यदि आप मुझे नेत्र-दृष्टि के साथ-साथ विवेक-दृष्टि भी दिला देते, तो मैं यह पाप कर्म कभी नहीं करता।
संत जी ने उसी समय संकल्प ले लिया कि वह मरीजों की सेवा-सहायता करने के साथ-साथ उन्हें धर्म मार्ग पर चलने, संयम और सादगी का जीवन जीने का उपदेश भी देते रहेंगे।