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कूटनीति: परीक्षा का नया मंच तैयार हो रहा है... चीन और भारत के रिश्ते पर अब पूरी दुनिया की नजरें

केएस तोमर
Updated Fri, 22 Aug 2025 06:30 AM IST

सार

प्रधानमंत्री मोदी का एससीओ बैठक में शामिल होने का जिनपिंग का न्योता स्वीकारना और अब भारत में चीन के राजदूत शू फिहोंग का भारत पर ट्रंप के टैरिफ का कड़ा विरोध जताते हुए यह कहना कि चीन पूरी ताकत से भारत के साथ खड़ा हुआ है, बताता है कि कूटनीतिक परीक्षा का एक बड़ा मंच तैयार हो रहा है।
 
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चीन और भारत के झंडे - फोटो : Freepik


शिखर सम्मेलन से उम्मीद : एससीओ सम्मेलन में भारत न सिर्फ चीन, बल्कि रूस, मध्य एशियाई देशों, पाकिस्तान और ईरान जैसे नए सदस्यों के साथ भी वार्ता करेगा। भारत ने एससीओ में सतर्कता बरती है और इस मंच का इस्तेमाल अक्सर व्यापक गठबंधन के मंच के बजाय संपर्क और आतंकवाद-रोधी संवाद के लिए ज्यादा किया है। फिर भी, यूक्रेन युद्ध, अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे और मध्य एशिया में बदलते सत्ता समीकरणों को देखते हुए मोदी के हस्तक्षेप पर कड़ी नजर रहेगी। भारत एससीओ में चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को बढ़ावा दिए जाने को लेकर चिंतित हो सकता है, लेकिन उसे इस बैठक में अपनी जगह बनाए रखने में सार्थकता नजर आती है। मोदी का व्याख्यान बहुध्रुवीय यूरेशिया के भारत के दृष्टिकोण को स्पष्ट कर सकता है, जहां कोई भी एक शक्ति अपनी शर्तें नहीं थोपेगी-यह बीजिंग के लिए एक सूक्ष्म संकेत है कि भारत गौण भूमिका नहीं निभाएगा।


नतीजे जो निकल सकते हैं : असल मसला तो पूरे एससीओ सम्मेलन से परे मोदी और जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक को लेकर है। भले ही सीमा विवाद पर तत्काल कोई सफलता न मिले, पर कुछ हल निकाले जा सकते हैं : पहला, अगर दोनों नेता सीमा वार्ता तंत्र की प्रगति का समर्थन करते हैं, तो यह सैन्य कमांडरों के लिए चरणबद्ध सैन्य वापसी को अंतिम रूप देने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। दूसरा, चीन व्यापार संबंधी बाधाओं को कम करने के लिए लक्षित रियायतों की मांग कर सकता है, जैसे कि महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्यात प्रतिबंधों में ढील देना, जिनकी भारत को नवीकरणीय ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के लिए जरूरत है। बीजिंग भारत पर उच्च तकनीक और विनिर्माण में चीनी निवेश पर प्रतिबंधों को कम करने के लिए दबाव डाल सकता है। तीसरा, रुके हुए सांस्कृतिक आदान-प्रदान, शैक्षणिक कार्यक्रमों और विस्तारित तीर्थयात्राओं को फिर से शुरू करने की घोषणा विश्वास-निर्माण उपायों के रूप में की जा सकती है। अंतिम बात यह कि मोदी और जिनपिंग जलवायु वार्ता, विश्व व्यापार संगठन सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए जरूरी साझा मुद्दों की पहचान कर सकते हैं।


आसान नहीं विश्वास बहाली : चीन के साथ विश्वास बहाल करना आसान नहीं है। एलएसी गतिरोध ने सैन्य और राजनीतिक, दोनों स्तरों पर जख्म दिए हैं। बीजिंग के प्रति आम भारतीय जनता की राय तीव्र रूप से नकारात्मक है, तो खुद जिनपिंग भी अपने घरेलू राष्ट्रवादी दबावों के चलते लचीलापन दिखाने को तैयार नहीं हैं। फिर भी, मोदी-शी संबंधों का पुनर्निर्धारण भावनात्मक मेल-मिलाप के बजाय व्यावहारिक आधार पर हो सकता है। नहीं भूलना चाहिए कि प्रतिबंधों के बावजूद, द्विपक्षीय व्यापार 2024 में 135 अरब डॉलर को पार कर गया, जिससे चीन भारत के सबसे बड़े साझेदारों में से एक बन गया। भारत की विनिर्माण महत्वाकांक्षाओं के लिए चुनिंदा चीनी तकनीक और घटक अपरिहार्य बने हुए हैं। इसके अतिरिक्त, भारत और चीन, दोनों ही अस्थिर अफगानिस्तान, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भरता की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जिन पर दोनों ही समन्वित दृष्टिकोण से काम कर सकते हैं। दोनों देश खुद को वैश्विक दक्षिण के नेता के रूप में देखते हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धा अक्सर सहयोग पर भारी पड़ती है। अगर मोदी सहभागिता को समझौते के बजाय एक व्यावहारिक जरूरत के रूप में प्रस्तुत कर सकें, तो इससे तनाव कम करने के लिए राजनीतिक जगह बन सकती है।


ट्रंप का टैरिफ : यदि ट्रंप का संरक्षणवादी रवैया बदस्तूर जारी रहता है, तो दोनों एशियाई दिग्गजों की घनिष्ठता बढ़ सकती है और अगर ऐसा होता है, तो वाशिंगटन में इसका पूरा गुणा-भाग किया जाएगा। बाइडन के कार्यकाल में भारत और अमेरिका ने क्वाड, रक्षा समझौतों और तकनीकी साझेदारियों के जरिये अपने रणनीतिक संबंधों को गहरा किया, लेकिन 2025 में ट्रंप की वापसी के बाद से उनके व्यवहार ने भारत को बेचैन कर दिया है। इसके साथ ही भारत वाशिंगटन को भी संदेश देना चाहता है कि वह अपनी स्वायत्तता के लिए जरूरत पड़ने पर बीजिंग के साथ भी संवाद कर सकता है।


अतीत, वर्तमान और संभावनाएं : भारत और चीन के संबंधों में ऐतिहासिक रूप से उतार-चढ़ाव रहा है। 2020 में हुई गलवान घाटी झड़प के बाद यह मोदी की पहली चीन यात्रा होगी, जब दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध 1962 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। हालांकि, बीते कुछ महीनों में फिर से दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर की वार्ताओं के जरिये संबंधों पर जमी बर्फ पिघलाने के प्रयास शुरू हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की एससीओ सम्मेलन के लिए चीन यात्रा प्रतीकात्मकता और सार्थकता से भरपूर है। उम्मीद है कि भारत और चीन मिलकर सीमा, व्यापार जैसे मसलों को सुलझाने की दिशों में कदम बढ़ाएंगे और संवाद को पुनर्जीवित करेंगे। भारत के लिए मोदी की यात्रा यह सुनिश्चित करने के लिए भी है कि वह चीन के साथ स्थायी शत्रुता में न फंसकर अमेरिका और रूस के साथ उसके अपने संबंध मजबूत बनाए रखे। चीन के लिए इसका उद्देश्य विश्व को यह दिखाना है कि मतभेदों के बावजूद वह भारत के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ सकता है। दुनिया के लिए इस यात्रा के निहितार्थ ये हैं कि 21वीं सदी में वैश्विक स्थिरता के लिए भारत-चीन के संबंध बहाल होना जरूरी है।  

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