जब कोलाहल थम जाएगा, भावनाएं शांत हो जाएंगी, भारत के खबरिया टीवी चैनल किसी बड़े संकट या कुछ चटपटी खबरों का रुख कर लेंगे, तो देवयानी खोबरागड़े मामले का क्या होगा? न्यूयॉर्क स्थित भारत के इस राजनयिक को उनकी बेटी के स्कूल के सामने गिरफ्तार किया गया, कपड़े उतारकर तलाशी ली गई और कुख्यात अपराधियों के बीच रखा गया। यह सब सबसे पुराने लोकतंत्र में हुआ, जहां के शीर्ष नेता यह घोषणा करते नहीं थकते कि भारत के साथ उनके संबंध '21वीं सदी के सबसे निर्णायक संबंध' हैं। अफसोस की बात है कि ये दोनों छवियां मेल नहीं खातीं।
क्या एक सभ्य लोकतंत्र से ज्यादा परिपक्व और संवेदनशील व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती? नम्र शब्दों में कहें, तो भारतीय राजनयिक को जिस तरह से गिरफ्तार कर हथकड़ी पहनाई गई, वह अशिष्ट, असभ्य और भयावह रूप से अराजनयिक था। ऐसा तो एक सामान्य सिपाही के साथ भी नहीं किया जाता! सबसे हैरानी की बात यह है कि इस दुर्व्यवहार को अमेरिकी विदेश विभाग से मंजूरी मिली थी!
यदि अमेरिकी विदेश विभाग अपने कथित ‘रणनीतिक साझेदार’ देश के राजनयिकों के साथ ऐसे व्यवहार का इच्छुक है, तो ऐसी साझेदारी का कोई मतलब नहीं है! अमेरिका को अपने शब्दों की कीमत समझनी चाहिए, अन्यथा कोई भी उसकी बातों पर यकीन नहीं करेगा। उसके पास बचाव का कोई रास्ता नहीं है। वह मानव तस्करी का आरोप लगाने और गिरफ्तारी करने, दोनों मामलों में गलत था। क्या यह इतना बड़ा मामला नहीं है कि खेद जताया जाए?
यदि देवयानी के खिलाफ लगाए गए आरोप-अमेरिकी न्यूनतम मजदूरी कानून का उल्लंघन और वीजा आवेदन में गलत जानकारियां देने का आरोप (इसे अदालत में अभी प्रमाणित होना बाकी है) सही थे, तो क्या ये उल्लंघन अमेरिकी हितों के लिए इतने खतरनाक थे कि उन्हें प्रताड़ित किया जाना चाहिए! वह न तो अल कायदा की गुप्तचर थीं और न ही अमेरिका से भाग रही थीं, तो फिर राजनयिक स्तर पर इस मामले को क्यों नहीं सुलझाया गया? सामान्य मजदूरी विवाद को मानव तस्करी के अपराध में बदलना और इसे एक बदसूरत एवं अवांछित सार्वजनिक विवाद बनने देना अमेरिकी विदेश विभाग के असली इरादों के प्रति संदेह पैदा करता है। जाहिर है, डिस्ट्रिक अटॉर्नी प्रीत भरारा ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए इस मामले का उपयोग किया।
नौकरानी के रूप में अमेरिका जाने वाली संगीता इससे पूरी तरह वाकिफ थी कि वहां रहकर काम करने के लिए उसे कितना पैसा मिलेगा। दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास ने उसके पति एवं बेटी को भारत से 'बाहर निकलने' में मदद की। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी दूतावास ने उनके लिए हवाई जहाज का टिकट खरीदा, क्यों? भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत बनाने के लिए?
मित्र देशों के राजनयिक जब प्रतिबंधित चीजों की तस्करी की कोशिश में पकड़े जाते हैं, तो भारतीय अधिकारी न तो उन्हें गिरफ्तार करके हथकड़ी पहनाते हैं और न ही मामले को सार्वजनिक करते हैं। वे संबंधित देश को सलाह देते हैं कि उन्हें भारत से बाहर स्थानांतरित कर दिया जाए। अमेरिका को भी ऐसा ही करना चाहिए था।
राजनयिकों के विशेषाधिकार और राजनयिक द्वारा किए गए अमेरिकी कानून के उल्लंघन पर अंतहीन बहस चलेगी, लेकिन इस मामले को अमेरिका के राजनीतिक फैसले से ही सुलझाया सकता है, जो उसके भारत के साथ संबंधों के महत्व के समग्र मूल्यांकन पर ही निर्भर करता है। चीन की बढ़ती मुखरता और आक्रामकता के साये में या एशिया के पुनर्संतुलन की दृष्टि से अमेरिका की नजर में भारत की जगह कहां है? अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षित एवं सुखद वापसी और उसके बाद वहां की स्थिरता के लिए भारत कैसे उपयोगी है?
क्या ईरान और अमेरिका के नवजात संबंधों में भारत की कोई भूमिका है? भारत जी-20, संयुक्त राष्ट्र एवं विश्व व्यापार संगठन की चर्चाओं और निर्णयों को कितना प्रभावित करता है? ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन पर छिड़ी बहस में भारत की जगह कहां है? इस तरह के कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जो भारत और अमेरिका के बहुआयामी, बहुस्तरीय और बढ़ते संबंधों को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा, द्विपक्षीय व्यापार और निवेश, खासकर तेजी से बढ़ता रक्षा व्यापार का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है।
यह कहना भोलापन होगा कि दोनों देशों का नेतृत्व इनसे वाकिफ नहीं है। यह कल्पना से परे है कि घरेलू नौकरानी से संबंधित मसले को लेकर ऐसे रिश्ते को पटरी से उतारने की अनुमति दी जा सकती है! शांत कूटनीति से ही इसे हल किया जा सकता है। कूटनीति दादागीरी नहीं है, यह संवेदनशील मुद्दों को राजनयिक कुशलता से निपटाता है। राजनय में व्यापक राष्ट्रीय हितों की कभी अनदेखी नहीं की जाती।
भारत और अमेरिका को, मीडिया की नजरों से अलग, इस गतिरोध के बेहतर समाधान के लिए स्पष्ट वार्ता करनी चाहिए। कानूनी लड़ाई बहुत दूर नहीं ले जाएगा। जब मोरारजी देसाई सेमूर हर्ष के खिलाफ मानहानि का मामला जीत नहीं सके, तो देवयानी के लिए कितनी उम्मीद है? अगर अमेरिका को इस मामले को सुलझाने की इच्छा होगी, तो वे उपाय खोज सकते हैं।
हर वर्ष दर्जनों घरेलू नौकर राजनयिकों के साथ भारत से अमेरिका जाते हैं और गुम हो जाते हैं। अगर अमेरिकी अधिकारी यह कहते हैं कि वे इससे वाकिफ नहीं हैं, तो वे मजाक कर रहे हैं। असल में घरेलू नौकरों से संबंधित एक द्विपक्षीय समझौता व्यावहारिक उपाय हो सकता है।