अपराधियों ने हिंदू महिला के साथ हुई क्रूरता का वीडियो जिस तरह से युद्ध की ट्रॉफी वाले अंदाज में डाला, कम से कम उससे तो यही जाहिर होता है। अब तक जिन पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें मुख्य आरोपी फजोर अली भी शामिल है, जो बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) से जुड़ा बताया जा रहा है।
मामले के तूल पकड़ने के बाद बेशक बांग्लादेश हाईकोर्ट ने वायरल वीडियो को तुरंत हटाने और पीड़िता की सुरक्षा व चिकित्सा सुनिश्चित करने के आदेश दिए हैं, लेकिन घटना की एफआईआर दर्ज करने में देरी, पहले 24 घंटों के भीतर चिकित्सा जांच न कराना और पीड़िता के अधिकारों के प्रति जिस तरह का उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया गया, वह व्यवस्थागत लापरवाही का ही उदाहरण है।
बांग्लादेशी अल्पसंख्यकों के लिए मानवाधिकार कांग्रेस (एचआरसीबीएम) की रिपोर्ट तो और भी दहलाने वाली है, जिसके अनुसार कुमिल्ला जिले में हिंदू महिलाओं के साथ दुष्कर्म का यह कोई पहला मामला नहीं है। अप्रैल के बाद से अब तक इस तरह के तेरह मामले दर्ज किए गए हैं।
इसके अलावा, लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन इत्यादि की जो खबरें मिल रही हैं, उन पर प्रशासन के रवैये से तो यही पता चलता है कि बांग्लादेश में अंतरिम सरकार इसे कोई मुद्दा ही नहीं मानती। यह स्थिति बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता और हिंसा के माहौल को दर्शाती है।
गौरतलब है कि बांग्लादेश में इस वक्त आठ फीसदी से भी कम हिंदू हैं और उनकी आबादी लगातार घटती जा रही है। अंतरिम सरकार के गठन के समय से लेकर अब तक इसके प्रमुख मोहम्मद यूनुस का जो रवैया रहा है, उसे देखकर हिंदू महिला के साथ हुई ज्यादती पर उनकी चुप्पी अप्रत्याशित नहीं लगती। लेकिन जब बांग्लादेश ने दूसरा पाकिस्तान होने की ठान ही ली है, तो जरूरी हो जाता है कि भारत कूटनीतिक व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को इस तरह उठाए कि बांग्लादेश पर जवाबदेही का दबाव बने।