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दिल्ली की ओर जाने का दुर्गम रास्ता

Tue, 10 Sep 2013 07:41 PM IST
हरीश चंद्र पंत
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उत्तर प्रदेश से होकर ही दिल्ली की सत्ता का रास्ता जाता है। 75 जिले और 20 करोड़ की आबादी हर पांच साल पर 80 सांसदों को लोकसभा भेजती है। यह सूबा देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री दे चुका है। कोई भी दल या गठबंधन जब तक उत्तर प्रदेश की कुल लोकसभा सीटों में से दो तिहाई सीटें न जुटा ले, उसका केंद्र में सरकार बनाना कठिन है। इसीलिए सभी प्रमुख पार्टियां उत्तर प्रदेश में जोर लगा रही हैं और वहां से अधिक से अधिक सीटें जीतना चाहती हैं।
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आइए, उत्तर प्रदेश की राजनीतिक संभावनाओं पर नजर डालें। कांग्रेस और भाजपा की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उनके पास उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई कद्दावर नेता नहीं है, जो उन्हें दिल्ली की गद्दी पर बिठा सके। कांग्रेस की आखिरी नेता इंदिरा गांधी थीं और अटल बिहारी वाजपेयी (जब तक सक्रिय रहे) भाजपा के नेता थे।

इन दोनों के नाम पर उनकी पार्टियां वोट मांगती थीं। इन दोनों ही पार्टियों में अंदरूनी कलह भी कम नहीं है। स्थानीय वरिष्ठ नेता आपसी अविश्वास के कारण भितरघात में ही व्यस्त हैं। इसलिए कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने ही 2014 के चुनावों की कमान अपनी पार्टियों के गुजरात के नेताओं के हाथों में सौंप दी है। भाजपा की कमान जहां अमित शाह संभाले हुए हैं, वहीं कांग्रेस की मधुसूदन मिस्री। वे अपने पार्टी दफ्तर में बैठकर रणनीति तो बना सकते हैं, लेकिन सूबे की जनता का दिल शायद न जीत पाएं।
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तीसरे विकल्प की सबसे प्रखर आवाज उठाने वाली समाजवादी पार्टी का एक वर्ष में ही बुरा हाल है। 2012 के चुनाव में जनता को पार्टी के युवा नेता में आशा की किरण दिखी और एक लंबे अंतराल के बाद पार्टी को बहुमत दिया। मगर राज्य की सपा सरकार में अखिलेश यादव को छोड़कर बाकी सभी पुराने मंत्री हैं, जिनमें से कई के विरुद्ध गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।

इसके अलावा प्रशासन पर भी वह कोई छाप नहीं छोड़ सके हैं। बल्कि सचिवालय से लेकर निचले स्तर पर जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। राजनीतिक वजहें चाहे जो भी हों, लेकिन यदि 2014 को ध्यान में रखकर सपा दिल्ली की सत्ता पाने की लालसा संजोए है, तो यह अभी दिवास्वप्न की तरह ही है।

यदि इतिहास और आंकड़ों पर गौर करें, तो उत्तर प्रदेश की हकीकत और स्पष्ट रूप में सामने आती है। सूबे में छह करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे गुजर-बसर करने को मजबूर हैं, जिन्हें रिझाना राजनीतिक पार्टियों के लिए आसान है। कुल मतदाताओं में से 80 फीसदी से अधिक हिंदू हैं और 18 फीसदी के करीब मुस्लिम। उत्तर प्रदेश में कुल 12.7 करोड़ मतदाता हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में कुल 59.48 फीसदी मतदान हुआ था।

गौर करने वाली बात है कि 58.8 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 60.20 फीसदी महिलाओं ने तब वोट डाले थे। जाहिर है, महिलाओं को रिझाने के भी प्रयास काफी हुए थे। आश्चर्य नहीं कि कन्याधन, साड़ियां और सिलाई मशीन जैसी घोषणाएं आगामी चुनाव में भी हों। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पारंपरिक रूप से मुकाबला सपा और बसपा के बीच ही था, जिसमें बसपा ने 126 सीटें गंवाई थीं, जिसमें अधिकांश सपा के खाते में गई थीं। अब जरा पिछले लोकसभा चुनाव पर विचार करें। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में सपा ने 2004 के लोकसभा चुनाव में उसे कुल मिली सीटों में से 12 खो दी थीं। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा को राज्य में 23, कांग्रेस को 21, बसपा को 20 और भाजपा को 10 सीटें मिली थीं।

पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच पूरे देश में 115 सीटों पर सीधा मुकाबला हुआ था। लेकिन उत्तर प्रदेश में इन दोनों दलों के बीच सीधे मुकाबले की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि वहां सपा और बसपा भी हैं। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को आगे कर माहौल को गरमाने की कोशिश जरूर की है, पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित काफी उलझा हुआ है, जहां थोड़े से मतों के अंतर से बाजी पलट सकती है। इसके अलावा जातिगत समीकरणों के साथ ही दूसरे बहुत से कारक भी काम करते हैं। मगर यह तय है कि 2014 में भी दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर गुजरेगा।
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