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महंगा डीजल महंगाई बढ़ाएगा

Mon, 18 Mar 2013 11:03 AM IST
उपेंद्र प्रसाद
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डीजल की कीमतों की तथाकथित आंशिक नियंत्रण मुक्ति के निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि सरकार महंगाई को समस्या ही नहीं मानती। पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने के बाद वह डीजल की कीमतों को भी विनियंत्रित करने का संकेत दे रही थी। लेकिन अपनी उस मंशा को उसने बहुत गलत समय पर अंजाम दिया है। पिछले कई साल से महंगाई देश में एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है।
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पिछले आंकड़े में कुछ राहत दिखाई पड़ रही थी, पर मुद्रास्फीति की दर अब भी बहुत ऊंची है। महंगाई ने विकास दर को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। औद्योगिक उत्पादन के मोर्चे पर मिल रही विफलता महंगाई का सीधा परिणाम है, क्योंकि मुद्रास्फीति ने लोगों की प्रभावी आमदनी को कम दिया है और लोगों की क्रयशक्ति में काफी कमी आ गई है। कम क्रयशक्ति बाजार में वस्तुओं की मांग को कमजोर कर रही है और मांग कमजोर होने के कारण उत्पादकों को अपने उत्पादों में कमी करनी पड़ रही है।

यदि मुद्रास्फीति दर ऊंची बनी रही, तो हम विकास दर को तेज करने के बारे में सोच भी नहीं सकते। लेकिन मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र को अब भी लग रहा है कि कीमतें बढ़ाकर विकास दर बढ़ाई जा सकती है। सरकार डीजल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त कर इसे महंगा करने का मार्ग प्रशस्त कर रही है, और डीजल की बढ़ी कीमत माल ढुलाई को महंगा कर महंगाई को और तेज करने वाली है।
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बिजली की किल्लत के कारण किसान सिंचाई के लिए डीजल मोटर पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं। उनके ट्रैक्टर भी डीजल से चलते हैं। जाहिर है, डीजल की बढ़ी कीमत खेती की उत्पादन लागत भी बढ़ा देगी। पहले से ही कर्ज की समस्या से ग्रस्त किसानों को और कर्ज लेने पड़ेंगे। किसानों की आत्महत्याओं का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। ऐसे में, डीजल की कीमत बढ़ाने का रास्ता साफ कर कैसा  आर्थिक सुधार किया जा रहा है?

वीरप्पा मोइली कहते हैं कि डीजल की कीमत को आंशिक तौर पर ही नियंत्रण मुक्त किया गया है और तेल कंपनियां एक साथ कीमतों में वृद्धि नहीं कर सकतीं। पर उनके इस बयान का कोई मतलब नहीं है। तेल कंपनियों का कहना है कि अभी डीजल पर 9.25 रुपये की सब्सिडी दी जा रही है। सरकार का आशय यह है कि 9.25 रुपये की वृद्धि तेल कंपनियां एक झटके में नहीं, बल्कि धीरे-धीरे कर सकती हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था पर तो इसका असर उतना ही घातक होगा, जितना एक झटके में कीमत वृद्धि में होगा।

सिर्फ जन असंतोष को रोकने के लिए ही किस्तों में कीमत बढ़ाने का खेल चल रहा है। सरकार कह रही है कि उसकी नजर हमेशा तेल कंपनियों की कीमतों पर बनी रहेगी। लेकिन इसमें नया क्या है! सच कहें, तो डीजल की कीमत उतनी ही नियंत्रण मुक्त हुई है, जितनी नियंत्रण मुक्त पेट्रोल की कीमत है। जब से पेट्रोल को नियंत्रण मुक्त किया गया, तब से उसकी कीमत 30 फीसदी ज्यादा बढ़ गई है। महंगे पेट्रोल की सीधी मार उसका उपभोग कर रहे उपभोक्ताओं पर पड़ती है, जबकि डीजल की कीमतों में वृद्धि की चपेट में देश की शत-प्रतिशत आबादी आ जाएगी।

सरकार का कहना है कि वह डीजल पर और सब्सिडी बर्दाश्त नहीं कर सकती। उसके लिए सालाना 10 हजार करोड़ रुपये भी सरकारी खजाने से नहीं निकल रहे, जबकि उस पर लगाए गए टैक्स से सरकार के खजाने में कई गुना ज्यादा राजस्व आ रहा है। इसलिए पहले तो यही कहना गलत है कि सरकार डीजल के उपभोक्ताओं को सब्सिडी दे रही है, क्योंकि यदि प्रति लीटर डीजल पर नौ रुपये सब्सिडी देने का उसका दावा है, तो एक लीटर से केंद्र और राज्य सरकारों को कितना टैक्स मिलता है, वह क्यों नहीं बताती? यदि वह इस आंकड़े को भी सब्सिडी के आंकड़े के साथ रख दे, तो पता चलेगा कि सरकार किसी प्रकार की सब्सिडी दे ही नहीं रही, बल्कि उल्टे टैक्स प्राप्त कर रही है।

यह मान लें कि सरकार को टैक्स चाहिए और उसका एक स्रोत डीजल व अन्य तेल उत्पाद हैं, तब भी यह निर्णय सही नहीं है। सरकार चाहती, तो तथाकथित सब्सिडी को दूसरे तरीके से खत्म कर सकती थी। वह चाहे, तो अब भी ऐसा कर सकती है। उसे बस डीजल की दो कीमतें तय करनी होंगी।

एक कीमत खेती और सार्वजनिक परिवहन के उपयोग वाले प्राथमिकता क्षेत्र के लिए, दूसरी कीमत होटलों, मॉल, टेलीफोन टावरों व निजी गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले डीजल के लिए। प्राथमिकता वाले क्षेत्र को कम कीमत पर सरकार डीजल उपलब्ध करा सकती है, और गैर प्राथमिकता वाले दूसरे क्षेत्रों से सरकार मुनाफा भी कमा सकती है। इस तरह के मुनाफे से सब्सिडी समाप्त की जा सकती है। जब जयपाल रेड्डी पेट्रोलियम मंत्री थे, तब उनके पास ऐसा एक प्रस्ताव था, पर मोइली ने इसकी अनदेखी कर दी।

ग्रीन पीस ने अपने सर्वेक्षण में पाया है कि सिर्फ सेलफोन टावरों के जेनरेटरों द्वारा ही डीजल सब्सिडी का 2,600 करोड़ रुपये का इस्तेमाल हो रहा है। यदि हम होटलों और मॉल के जेनरेटरों और निजी गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले डीजल द्वारा इस्तेमाल की जा रही सब्सिडी पर ध्यान दें, तो यह बहुत ज्यादा हो जाती है। सरकारी फैसले के बाद तेल कंपनियों ने दोहरी मूल्य प्रणाली अपना भी ली है। वे भारतीय रेल तथा राज्य परिवहन निगमों से सवा नौ रुपये प्रति लीटर ज्यादा दाम वसूल करने लग गई हैं।

यानी अब रेल और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही बसों पर यात्री किराया बढ़ाने का दबाव बढ़ गया है। क्या यही दोहरी मूल्य प्रणाली दूसरे तरीके से नहीं लागू की जा सकती, जिसके तहत प्राथमिकता वाले खेती और सार्वजनिक परिवहन के लिए कम कीमत और गैर प्राथमिकता वाले अन्य क्षेत्रों के लिए ज्यादा कीमत पर डीजल मिले?
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