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भाषा-बोली: बोलियां हमें समृद्ध बनाती हैं, भाषा को बचाने के लिए जरूरी है इनको सहेजना

डॉ. श्याम प्रीति Published by: शिव शुक्ला Updated Mon, 31 Mar 2025 07:08 AM IST

सार

सरल बोलियां किसी भाषा को समृद्ध करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। भाषा को बचाने के लिए जरूरी है कि बोलियों को बचाया जाए।
 
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भाषा-बोली। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


इसी वजह से कहा जाता है कि भाषा में कई बोलियां समाहित हो सकती हैं, जबकि बोली का क्षेत्र सीमित रहता है। जैसे हिंदी भाषा में अनेक बोलियां हैं, जैसे-अवधी, ब्रजभाषा, बुंदेली, हरियाणवी, राजस्थानी आदि। इसी से हमारे यहां कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी की कहावत प्रसिद्ध है।


भाषा कोई भी हो, उसे शुद्ध रूप में लिखने और बोलने के लिए नियमों में बांधा गया है, जिसे व्याकरण कहा जाता है। विद्वानों का कहना है कि भाषा की शुद्धता और सुंदरता को बनाए रखने के लिए व्याकरण आवश्यक है। यदि वर्तनी सही न हो, तो शब्दों-वाक्यों के अर्थ बदल जाते हैं। यहां पर सरल मन रखने वाला व्यक्ति सवाल उठाता है कि कोई भाषा दाएं से बाएं चलती है और कोई बाएं से दाएं। यदि गणित की बात करें, तो रोमन में शून्य का चिह्न नहीं है, पर गणित वहां है। हिंदुस्तान की बात करें, तो कहीं पर किसी शब्द का लोप हो जाता है और कहीं पर किसी शब्द का...! यह बोली का परिणाम है, लेकिन इस सचाई से कौन इन्कार करेगा। बावजूद इसके भाषा शुद्धता की बात खत्म नहीं होती, जबकि सच यही है कि इस संसार में कोई भी पूर्ण नहीं है... यानी सभी में कुछ न कुछ कमियां हैं और आगे भी रहेंगी।


यदि भाषविद यही बात समझ लें, तो शायद बोलियों को अधिक महत्व मिलेगा। जैसे गुरुमुखी में आधे अक्षर (हलंत) का प्रयोग नहीं होता, तो हिंदी में उन शब्दों को लिखने पर उनका रूप बदल जाता है। यदि उसे यहां उसके शुद्ध रूप में लिखने का प्रयास किया जाए, तो नाम ही बदल जाएगा। शुद्धतावादी इसे अपनी जीत बताएं, पर जिस पर यह पहाड़ टूटेगा, वह शुद्धतावादी को कोसता नजर आएगा। साफ है कि बोलियां भले अशुद्ध मानी जाती हों, लेकिन इतना तय है कि जो आपस में संवाद करते हैं, उनमें एकजुटता दिखती है।


याद करें हिंदी फिल्म चुपके-चुपके को, जिसमें शुद्ध हिंदी बोलने वालों पर गहरा तंज कसा गया था। भाषा को सरल होना होगा, यदि ऐसे व्यंग्य से बचना है। यही कारण कि अखबारों में देशज शब्द का धड़ल्ले से प्रयोग किया जाता है। रेल को लौहपथ गामिनी कहने से हिंदी समृद्ध नहीं होती, बल्कि भाषाई विसंगतियों से हमें रूबरू कराती है। हमारी बोलियां हमें समृद्ध बनाती हैं। इसी प्रकार क्षेत्रीय भाषाएं और बोलियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। भाषा में व्याकरण की जरूरत तो है, पर उसे थोड़ा स्वतंत्र छोड़ना भी चाहिए।  


कोई भी भाषा, चाहे वह कितने ही छोटे क्षेत्र में बोली जाती हो, पर उसमें पारंपरिक ज्ञान का असीम खजाना होता है, लेकिन उपेक्षा का भाव होने से यह खजाना खुद-ब-खुद मिट जाता है। किसी एक इन्सान की मौत के साथ उसकी भाषा का भी अंतिम संस्कार हो जाता है।

उदाहरणार्थ- 26 जनवरी, 2010 को अंडमान द्वीप समूह की 85 वर्षीय बोआ के निधन के साथ अंडमानी भाषा ‘बो’ विलुप्त हो गई। वह इस भाषा को जानने, बोलने और लिखने वाली अंतिम व्यक्ति थीं। इसी प्रकार इससे पहले नवंबर, 2009 में एक और महिला बोरो की मौत के साथ ‘खोरा’ भाषा का अस्तित्व समाप्त हो गया था।
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स्पष्ट है कि किसी भाषा से पहले एक बोली का अंतिम संस्कार होता है। परिणामतः एक संस्कृति का विनाश हो जाता है। ऐसी स्थितियों में अनेक आदिम भाषाएं खत्म हो चुकी हैं और कई विलुप्ति के कगार पर हैं। भारत सरकार उन्हें बचाने की कोशिश कर रही है और हमें भी इस दिशा में सोचना होगा।


भाषा की समृद्धि के लिए जरूरी है कि उसे सरल बनाया जाए। अंग्रेजी शब्दकोश में दूसरी भाषाओं के शब्द आसानी से शामिल किए जाते हैं और धड़ल्ले से उनका प्रयोग भी किया जाने लगता है, वहीं अन्य भाषाओं में इस तथ्य की खोज करने पर भी जानकारी नहीं मिलती। शायद यही वजह है कि भाषाई तौर पर अंग्रेजी जहां आगे दिखती है, वहीं अन्य भाषाएं पिछड़ी नजर आती हैं। अंग्रेजी जानने वाले व्याकरण का कितना इस्तेमाल करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। साफ है कि अंग्रेजी भाषा बोली के तौर पर तेजी से आगे बढ़ी और अन्य भाषाओं पर हावी होती जा रही है, जो हमारी भाषाओं के भविष्य के लिए ठीक नहीं है।

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