भक्त कवि कुंभनदास ब्रज के जमुनावतो में खेती कर अपनी जीविका चलाते थे और शेष समय भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-उपासना तथा भक्तिगीत रचने में लगाते थे। एक बार राजा मानसिंह ब्रज यात्रा के समय श्रीनाथ जी के मंदिर में पहुंचे। वहां उन्होंने वीणा और मृदंग की ताल पर भक्त कुंभनदास को तन्मय होकर कीर्तन करते देखा। वह उनके मुख से सरस पद और कीर्तन सुनकर मंत्रमुग्ध हो उठे।
दूसरे दिन सवेरे राजा मानसिंह कवि कुंभनदास के दर्शनार्थ उनके घर जा पहुंचे। साष्टांग प्रणाम कर वह जमीन पर बैठ गए। राजा ने विनम्रता से कहा, महाराज, मैं आपके श्रीमुख से भगवान की भक्ति के पद सुनकर दर्शनार्थ आया हूं। मैं चाहता हूं कि जमुनावतो गांव आपके भेंट कर दूं। आज से इस गांव की तमाम जमीन के आप स्वामी बन जाएंगे।
भक्त कुंभनदास ने कहा, राजन, मेरी सबसे बड़ी जागीर तो श्रीनाथ जी की सेवा है। मुझे भूमि के लोभ में न फंसाएं। राजा मानसिंह ने स्वर्ण-मोहरों से भरी थैली भक्त कवि के चरणों में रख दी। यह देखते ही उन्होंने कहा, ब्रज के करील और बेर मेरे लिए आपके स्वर्ण मोहरों से ज्यादा कीमती हैं। यह धन मेरी साधना में बाधा बनकर मेरे पतन का कारण बन जाएगा। आप थैली वापस ले जाएं।
राजा मानसिंह भक्त कवि की अनूठी विरक्ति देखकर उनके चरणों में नतमस्तक हो उठे।