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बहस के केंद्र में विकास

पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 29 Jul 2018 06:28 PM IST
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मोदी-योगी

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव का प्रचार अभियान शुरू हो गया है और एक बार फिर से राजनेताओं के भाषणों व नारों में 'विकास' लौट आया है। आने वाले दिनों में हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रियों के मुंह से बिजली, शौचालय, कर्ज और कमजोर व सबसे नाजुक कृषि समुदायों व क्षेत्रों के विकास में अपनी सरकार की उपलब्धियों के बारे में बहुत कुछ सुनेंगे।



हाल ही में आजमगढ़ में 340 किलोमीटर लंबे पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे की आधारशिला रखते हुए मोदी ने इस अवसर को उत्तर प्रदेश के विकास में, विशेष रूप से पूर्वी हिस्से (पूर्वांचल) के विकास में एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में वर्णित किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि '340 किलोमीटर लंबा पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे उन नगरों और शहरों को बदल देगा, जिनसे होकर यह गुजरेगा। यह दिल्ली और गाजीपुर के बीच तेज कनेक्टिविटी भी प्रदान करेगा। यही नहीं, एक्सप्रेस-वे के साथ नए उद्योग और संस्थान विकसित हो सकते हैं।'


विकास को हर कोई पसंद करता है। सभी पार्टियां विकास की बात करती हैं। यह इस देश में राजनीतिक विमर्श का प्रमुख तत्व है। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली के दिल में वास्तव में विकास का क्या मतलब है, जहां से अभी हाल ही में तीन छोटी बच्चियों के भूख से मरने की खबर आई है? खबरों के मुताबिक, उसके रिक्शा चालक पिता का रिक्शा चोरी होने के बाद एक पखवाड़े से उसे कोई काम नहीं मिला था और उस घर में उन बच्चों का पेट भरने वाला अन्य कोई नहीं था। दूध के व्यवसायी रकबर खान की विधवा और उनके बच्चों के लिए इस विकास का क्या मतलब है, जिसकी भयानक मौत रहस्यों के घेरे में है? क्या उसकी हत्या राजस्थान के गोरक्षकों ने कर दी? या उसकी मौत पुलिस क्रूरता के कारण हुई, जैसा कि भाजपा के कुछ नेता आरोप लगा रहे हैं? समाचार पत्रों ने इसे लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) कहा है और हाल के दिनों में भीड़ द्वारा मारे गए लोगों की संख्या गिनाई है।


रकबर की क्रूर हत्या के बाद अब बहस इस बात को लेकर हो रही है कि क्या उसकी हत्या गोरक्षकों की भीड़ ने कर दी या पुलिस उत्पीड़न के कारण उसकी मौत हुई। स्थानीय नेता और स्थानीय पुलिस के बीच निरंतर इस मुद्दे पर तू-तू मैं-मैं जारी है। एक राष्ट्रीय दैनिक अखबार की खबर के मुताबिक, जब रकबर खान को कथित तौर पर गोरक्षकों द्वारा पीटा गया, तो पुलिस उसको अस्पताल ले जाने से पहले उसकी गायों को एक गौशाला में ले गई। पुलिस ने अपनी गलती स्वीकार की है। अब पुलिस हिरासत में उसकी मौत के आरोप लगाए जा रहे हैं। क्या इसका यही संदेश है कि यदि आप गरीब हैं, अल्पसंख्यक या हाशिये के तबके से ताल्लुक रखते हैं, तो अगर भीड़ आपकी हत्या नहीं करती, तो पुलिस कर देगी? या अगर पुलिस नहीं मारती, तो भीड़ मार देगी?


आखिर इससे देश में क्या संदेश जाता है? नरेंद्र मोदी की सरकार राज्य सरकारों को लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या) से निपटने के लिए सलाह दे रही है। लेकिन इस देश के 29 राज्यों में से 19 राज्यों में उसी पार्टी की सरकार है, जिसकी केंद्र में सरकार है, ऐसे में सोचने वाली बात है कि जिम्मेदार कौन है।


अब केंद्र सरकार ने बार-बार होने वाली लिंचिंग की घटनाओं से निपटने के लिए गृह सचिव राजीव गाबा के नेतृत्व में एक समिति बनाई है और सर्वोच्च न्यायालय ने भी भीड़तंत्र की इस नई लहर पर काबू पाने के लिए एक अलग कानून बनाने की सिफारिश की है। लेकिन तथ्य यह है कि इन सबका कोई मतलब नहीं होगा, अगर पुलिस स्वयं कानून के राज का सम्मान नहीं करेगी या उनके राजनीतिक आकाओं द्वारा कानून के राज को डुबाने के लिए दबाव डाला जाएगा।


हाल ही में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री से जब राज्यसभा में जब पूछा गया कि क्या सरकार देश के कई हिस्सों में बढ़ती भीड़ द्वारा की जने वाली हत्या की घटनाओं का कोई रिकॉर्ड रखती है, तो उन्होंने जवाब दिया कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) देश में भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं से संबंधित कोई विशेष आंकड़ा नहीं जुटाती है।
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लेकिन मार्च, 2018 में लोकसभा में जवाब देते हुए गृह मंत्रालय ने राज्यों द्वारा जुटाए गए भीड़ की हत्या से संबंधित कुछ आंकड़े पेश किए। गृह मंत्रालय द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2014 से तीन मार्च, 2018 के बीच नौ राज्यों में भीड़ द्वारा हत्या की चालीस घटनाओं में 45 लोगों की हत्या की गई और इन मामलों में कम से कम 217 आरोपी गिरफ्तार किए गए।


विकास का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होता है। सत्तारूढ़ भाजपा विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के लिए बड़े बुनियादी ढांचे से संबंधित परियोजनाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करती है। इसके विपरीत कांग्रेस नेतृत्व एक समावेशी भारत के अर्थ में विकास की बातचीत करता है, जहां उदार सिद्धांतों की प्रमुखता होती है। आने वाले महीनों में विकास के मुद्दे पर विपक्ष का ध्यान केंद्रित होने की संभावना है।


कोई व्यक्ति सभी चुनावी चर्चा को बयानबाजी कहकर खारिज कर सकता है, लेकिन तथ्य यह है कि किसी भी देश में भय के माहौल में वास्तविक विकास नहीं हो सकता है या यदि कुछ समुदायों को डर लगता है, तो वहां विकास होना असंभव है।

 

विकास पर चर्चा अब विशिष्टताओं पर ध्यान केंद्रित करना है। चाहे सत्तारूढ़ दल के राजनेता हों या विपक्षी पार्टियों के, उन्हें विकास के बारे में आकर्षक जुमले उछालने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। देश के नागरिकों को न केवल राजनेताओं से जमीनी विकास की विस्तृत रिपोर्ट मांगनी चाहिए, बल्कि यह भी पूछना चाहिए कि उससे आखिर किसको फायदा पहुंचा और किसको नहीं। जब विकास की बात आती है, तो यह पूछना बेहद महत्वपूर्ण है कि किसने उस विकास का लाभ उठाया और किसे उससे वंचित रखा गया।

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