पहाड़ों को टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में बनाने की कवायद हमेशा ही रही है। कुछ हद तक शायद यह पहाड़ों की आवश्यकता भी रही है, जहां रोजगार के ज्यादा साधन नहीं हैं। उत्तराखंड के केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री में लाखों श्रद्धालु हर साल धार्मिक पर्यटक के रूप में आते हैं। लेकिन कुछ समय से एक नई प्रवृत्ति शुरू हुई है। जैसे ही मैदानी इलाकों में गर्मी जोर पकड़ती है, लोग पहाडों का रुख कर लेते हैं। इस साल अब तक 28 लाख लोग पहाड़ पर पहुंच चुके हैं। पर पहाड़ों में इस बार दोनों ही तरफ बड़ी चोट पहुंची है, जो अप्रत्याशित भीड़ के रूप में हमारे बीच में आई। जैसे ही इस बार की गर्मी ने मैदानों को तिलमिलाया, दो-चार दिन के लिए सबने पहाडों का रुख कर लिया।
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश का शासन-प्रशासन इस बात के लिए कतई तैयार नहीं था और न ही यह कल्पना की गई थी कि पहाड़ में पर्यटकों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ जो लोग उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश को देखने और आनंद लेने की अपेक्षाओं से आए थे, उन्हें असुविधा हुई, क्योंकि कई किलोमीटर लंबे घंटों के जाम के साथ तमाम तरह की अव्यवस्थाओं व असुविधाओं ने उन पर गलत तरह की छाप निश्चित रूप से छोड़ दी और शायद अगली बार वे सोच-समझ कर ही पहाड़ का रुख करेंगे।
रोजगार के रूप में पर्यटन की समीक्षा करने का समय आज आ चुका है। ढेर सारी संख्या में पर्यटकों के आवागमन, रहने-खाने और अन्य व्यवस्थाओं को कहीं-कहीं हल्के में लिया जाता रहा है। हमने केदारनाथ की घटना के बाद भी नहीं सीखा कि हमें रेगूलेटेड टूरिज्म यानी विनियमित पर्यटन पर ध्यान देना चाहिए। पहाड़ों पर लोग पहले भी आते रहे हैं, लेकिन गाड़ियों की संख्या अब ज्यादा है।
औसतन एक जाम अगर चार घंटे का भी हुआ और उसमें 1,000 गाड़ियां फंसीं, तो इसमें तेल डीजल/पेट्रोल की खपत लगभग खड़े-खड़े ही 16,000 लीटर होगी। यही नहीं, ये गाड़ियां 2.5 किलोग्राम के हिसाब से 32,000 किलो कार्बन डाई ऑक्साइड उगल देगी। इसमें एक तरफ जहां आर्थिक नुकसान जुड़ा है, वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण की मार भी पड़ती है और समय की बर्बादी इससे अलग। ऐसी स्थिति में पर्यटकों की आस्था और आनंद हवा हो जाएंगे।