विकास के तेज रथ पर सवार भारत के बड़े-बड़े शहर कभी प्रदूषण के गैस चैंबर बन जाते हैं, तो कभी बाढ़ में डूब जाते हैं। मिसाल के तौर पर वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में हवा की गुणवत्ता में गिरावट की चिंताजनक दर यातायात की भीड़, व्यापक निर्माण से धूल और औद्योगिक प्रदूषण के कारण होती है, लेकिन यह इन्हीं तक सीमित नहीं है। भीषण गर्मियों के दौरान कूलिंग के लिए बिजली की बढ़ी मांग, भूजल के गिरते जल स्तर और पानी की कमी से इन शहरों की आबादी विकास की चमक-दमक के बावजूद त्राहि-त्राहि करने लगती है। चाहे राजधानी दिल्ली हो या फिर भारत की मिलेनियम सिटी के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा गुरुग्राम या फिर भारत की व्यापार नगरी मुंबई।
दरअसल, भारत के अधिकांश शहर दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती जनसंख्या, ट्रैफिक जाम, पीने योग्य पानी की कमी और लगातार बढ़ते जहरीले लैंडफिल के कचरे, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे, पर्यावरणीय गिरावट और वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और यह रहने लायक नहीं बचे हैं। जहां एक तरफ उत्तर भारत के सभी नगरों समेत दिल्ली, मुंबई, कोलकाता आदि में हर साल जाड़े का मौसम आते ही लोग वायु प्रदूषण से बेहाल, दम घोंटू हालात का सामना करने पर मजबूर नजर आते हैं। वहीं बंगलूरू और चेन्नई में, गर्मियों के दौरान पानी की कमी और इसके विपरीत, मानसून के दौरान बाढ़ से सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। पिछले दो दशकों में बंगलूरू एवं पुणे, बेहतर मौसम, अच्छे रोजगार के अवसर, हरियाली और व्यवस्था के चलते आकर्षण का केंद्र व सबसे ज्यादा ‘इन डिमांड’ रहे। महानगरीय संस्कृति, सुरक्षित माहौल, और काफी मजबूत रोजगार व्यवस्था ने इन्हें प्रिय बना दिया। लेकिन, आज इसी बंगलूरू शहर को प्रतिदिन 50 करोड़ लीटर पीने के पानी की कमी हो रही है, जो कि शहर की कुल जरूरत का पांचवां हिस्सा है।
वैश्विक यातायात भीड़ सूचकांक 2023 में बंगलूरू को भारत का सबसे भीड़-भाड़ वाला शहर घोषित किया गया था। गर्मी के मौसम में बेतहाशा गर्म तापमान के साथ ही, यहां बार-बार बाढ़ आने से जीवन हर साल अस्त-व्यस्त होता है। कमोबेश यही हाल पुणे का भी है। इस साल गर्मी के मौसम में, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, पुणे में दिन का तापमान 43.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। हाल ही में इस साल, पुणे में भयानक बाढ़ आई थी, जब शहर के कई हिस्से जलमग्न हो गए थे। बंगलूरू शहर सिंगापुर से सबक सीख सकता है, जो 1980 के दशक में पानी की गंभीर कमी से परेशान था। इसने वर्षा जल को एकत्र करने और उसका पुन: उपयोग करने और अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण करने के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण किया। दिल्ली इस मामले में बीजिंग और सियोल से भी सबक ले सकती है। साथ ही क्लाइमेट रेजिलिएंट सिटीज यानी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की रोकथाम से लैस शहर अब आज की दुनिया की जरूरत बन चुके हैं।