गंवई समाज के रैन बसेरे उजड़ गए। आधे-एक किलोमीटर तक लंबे घने पेड़ों के जो झुरमुट थे,वे अब नहीं रहे। आबादी बढ़ी और खेती की जमीन की मांग बढ़ी, तो पुराने बाग-बगीचे काट दिए गए। बाग-बगीचों का खत्म हो जाना, उनसे रगड़कर गुजरती हवा की ठंडक का खत्म हो जाना है। चिड़ियों के कलरव, उनके खेल-तमाशे, झगड़े और उनके प्यार के परवान का इतिहास में दफ्न हो जाना है। बागों का जाना चिड़ियों के घर-बसेरों का उजड़ जाना है। लोकगीतों में बागों और उसकी शोभा बढ़ाती चिड़ियों के बारे में तमाम गीत मौजूद हैं। एक सौ अमवा लगवलीं सवा सौ जामुन हो /रामा तबहुं न बगिया सोहावन एक रे कोइलिया बिनु। जहां बाग होते वहां पोखरे भी होते थे। शायद ही कोई ऐसा बाग हो, जहां पोखरे न खुदे हों। लोकगीतों में इस तथ्य को यों कहा गया है-बाबा मोरे बगिया लगवले कि पोखरा खोनवले ना। गर्मी के मौसम में घने पेड़ों की छांव में राह चलते पथिक को आराम मिलता। खेल-कूद, बतकहियों का दौर गर्मी के मौसम में बागों में चलता। बाग-बगीचों का खत्म हो जाने का ही परिणाम है कि बंदरों को आबादी के अंदर गुजर-बसर करने को बाध्य होना पड़ा है। तमाम जंगली जानवरों का संसार उजड़ता गया है।
यह सही है कि ज्यादातर बागों को सामंतों और राजा-रजवाड़ों ने ही लगवाया था। लखनऊ, बंगलूरू, देहरादून और जयपुर, बागों के शहर थे। लखनऊ के ज्यादातर इलाके बागों के नाम से जाने जाते थे। नाम तो आज भी हैं। लालबाग, ऐशबाग, कैसरबाग, सिकदंरबाग, तेलीबाग, बंदरिया बाग, अमीनाबाद, चारबाग, डालीबाग, कंपनीबाग, आदि-आदि । ब्रिटिश प्रशासक एच.सी. इरविन ने 1880 में ‘द गार्डन ऑफ इंडिया’ नामक एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी थी,जो आज भी अवध सहित पूरे भारत को समझने में हमारी मदद करती है। जयपुर के रामनिवास बाग, मुगल गार्डन, आमेर की केसर क्यारी, कनक वृंदावन या पर्यटन के लिए मशहूर निशातबाग, वृंदावन गार्डन, पिंजौर गार्डन या हैंगिंग गार्डन की बात छोड़ भी दें, तो गांवों में भी सैकड़ों एकड़ में बड़े-बड़े बाग थे, उनके नाम भी दूर-दूर तक विख्यात थे। झारखंड के हजारीबाग को कभी बागों का शहर कहा जाता था। आज सब कुछ खत्म हो चुका है।
आज बाजार की दृष्टि से बागवानी तो हो रही है। मगर यह हमारे परंपरागत बागों का स्थान नहीं ले सकती। बागों में फलों के प्रकार एवं स्वाद में विविधता थी। अब आप सीमित स्वाद और प्रकारों का ही आनंद ले पाते हैं। लकड़ी के प्रकार में विविधता थी। बुंदेलखंड की गरीब आबादी बंजर जमीनों पर उगे महुआ के बागों से इतना महुआ बटोर लेती थी कि बरसात के दिनों में सूखे महुआ से पेट भरता। बाग-बगीचों में पेड़ों की विविधता से गंवई जीवन को कई प्रकार से सहारा मिलता था। वातावरण को प्रदूषण रहित करने में बाग-बगीचे बेहद कारगर होते थे। बाग-बगीचों को खत्म कर हमने केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं किया है, सामुदायिकता की संस्कृति को भी खत्म किया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बागों के उजड़ने के कारण जमीन का क्षरण तेज हुआ है। हाथरस के आसपास के बेर, आम, और अमरूद के बाग उजड़ते गए, तो जमीन ऊसर और रेतीली होती गई।
आज बाग-बगीचों के न होने का परिणाम यह हो गया है कि प्रकृति, पर्यावरण और समाज संकट में आ घिरे हैं। देखना यह है कि आने वाला समाज इससे क्या सीख लेता है और इनके संरक्षण के बारे में क्या कुछ करता है।