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चार सप्ताह में चार कड़ियों का टूटना

श्यौराज सिंह बेचैन Published by: श्यौराज सिंह बेचैन Updated Sun, 04 Jul 2021 06:37 AM IST
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Sujata Parmita - फोटो : social media

पिछले महीने दलित सृजन शृंखला की चार कड़ियां टूट गईं। इनमें से पहली हैं सुजाता पारमिता, जिनका विगत छह जून को मुंबई में देहांत हो गया। सुजाता के पिता डॉ. देबेन्द्र कुमार बैसंत्री केंद्र सरकार के सूचना मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारी थे और जिन्होंने भारत के सामाजिक क्रांतिकारी जैसी पुस्तक लिखी थी। उनकी मां कौशल्या बैसंत्री डॉ. आंबेडकर के आंदोलन में डिप्रेस्ड क्लासेस वूमैन संगठन की कार्यकर्ता और दोहरा अभिशाप की लेखिका थीं। वर्ष 1974 में बिहार सरकार की छात्रवृत्ति पर पत्रकारिता की पढ़ाई करने गई सुजाता पारमिता ने नाटक में पेशेवर प्रशिक्षण लिया था। पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में सतीश शाह और राकेश बेदी के साथ अभिनय सीख सुजाता ने मुंबई फिल्म उद्योग में प्रवेश किया, किंतु वहां वह कोई जगह हासिल नहीं कर पाईं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में उन्होंने ओम पुरी और नसीरुद्दीन शाह के बैच में प्रशिक्षण लेने के बाद आह्वान थियेटर की स्थापना की। उन्होंने पहली नाट्य प्रस्तुति देवदासी श्रीराम सेंटर में की थी। दो दिन तक चली उनकी प्रस्तुतियों पर तत्कालीन मीडिया में अच्छी चर्चा हुई थी। उसके बाद अमेरिकी अश्वेतों की स्थिति पर उन्होंने कमानी ऑडिटोरियम में प्रस्तुति दी थी, फिर  सोवियत सांस्कृतिक केंद्र के सहयोग से तीजनबाई की नृत्य प्रस्तुतियां कराईं।



वर्ष 1976 में सुजाता ने अंतर्जातीय विवाह किया था। अभिजीत और चुमकी उनके दो बच्चे थे। मंडल आंदोलन के दौरान सुजाता का रुझान राजनीति में बढ़ा। उन्होंने जेएनयू में डॉ. नामवर सिंह के साथ बसपा संस्थापक कांशीराम से खुला संवाद कराया था, जिसमें प्रकाशराव अम्बेडकर और प्रो. नंदूराम शामिल थे। जीविका के लिए उन्होंने मुंबई एयरपोर्ट पर सेंटूर होटल में एस सीकोटे से एक दुकान ली और वस्त्रों का कारोबार करने लगीं। इधर वे अपने अनुभवों के बारे में लिखने-बताने लगी थीं। वर्ष 2015 में दिल्ली के कमला नेहरू कॉलेज में हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी में सुजाता ने ‘लोक नृत्य की दलित स्त्री’ विषय पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया था। पुत्र अभिजीत की मृत्यु से उन्हें गहरा आघात पहुंचा। उनकी बेटी चुमकी के मुताबिक, सुजाता कोरोना संक्रमण से निकल चुकी थीं, लेकिन किडनी खराब होने से उनकी मृत्यु हो गई।


जून में ही कोरोना संक्रमण के कारण गुजर गये सिद्धलिंगय्या ने कन्नड़ साहित्य में एमए कर कर्नाटक के बंगलूरू विश्वविद्यालय से साहित्य में पीएच.डी. की थी। बाद में वह उसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और डीन रहे। वर्ष 1988 से 2001 तक विधायक रहे सिद्धलिंगय्या हाल-हाल तक कर्नाटक सरकार के विकास प्राधिकरण बोर्ड के अध्यक्ष थे। उन्होंने कविता, नाटक, आलोचना, कहानी, निबंध आदि सभी विधाओं में लेखन किया। लेकिन उनकी आत्मकथा ऊरूकेरी बेहद चर्चित रही। आत्मकथा के प्रथम भाग का हिंदी अनुवाद गांव गली नाम से प्रो. टीवी.कट्टिमनी ने किया। सिद्धलिंगय्या ने झकझोर देने वाली आत्मकथा में लिखा-'हमने आश्चर्यजनक एक घटना देखी। दो लोग अपने कंधों पर हल का जुआ उठाए अय्यनूरू (जमींदार) का खेत जोत रहे थे और एक अन्य व्यक्ति उनके पीछे उन्हें हांक रहा था। दो लोगों को बैल की तरह हल खींचते और तीसरे को उन्हें धमकाते-हांकते देखना बड़ा ही अजीब लग रहा था। एक क्षण बाद ही तब मेरा कलेजा मुंह को आ गया, जब मैंने देखा कि हल खींच रहे दो लोगों में से एक मेरे पिता थे।'


विगत 20 जून को दिवंगत हुए सूरजपाल चौहान फुसावली, अलीगढ़ में एक वाल्मीकि परिवार में जन्मे थे। प्रयास, क्यों विश्वास करूं, कब होगी वह भोर, हैरी कब आएगा? तिरस्कृत और संतप्त जैसी कृतियों के रचयिता सूरजपाल चौहान राजेंद्र यादव की पत्रिका हंस और दिग्गज लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि के जरिये दलित साहित्य से जुड़े। उनकी दो महत्वपूर्ण कविताएं मेरा गांव कैसा गांव, न कहीं ठौर न कहीं ठौर, तथा ये दलितों की बस्ती है यथार्थवादी लेखन के अद्भुत उदाहरण हैं। इन दो रचनाओं की वजह से चौहान काफी लोकप्रिय हुए थे। दलित समाज उनसे ऐसे ही सार्थक लेखन की उम्मीद कर रहा था। लेकिन आखिरी दौर में वह दलित लेखकों-लेखिकाओं पर विवादास्पद टिप्पणियों के कारण ही ज्यादातर चर्चा में थे।


ऐसे ही विगत 13 जून को स्वर्गवासी हुए जसराम हरनौटिया ने करीब चालीस साल तक एससी/एसटी ट्रेड यूनियन का नेतृत्व किया। पिछले कुछ वर्षों से वह लेखन में सक्रिय हुए थे और दलित समस्याओं पर कविताएं-कहानियां लिखने के अलावा उन्हें तत्तापानी शीर्षक से आत्मकथा भी लिखी थी। बाबू जगजीवन राम के निकट रह चुके हरनौटिया जी बाबू जी और बाबा साहब आंबेडकर में समानताएं और सकारात्मक संबंधों की खोज कर रहे थे। उनकी मान्यता थी कि गांधी जी ने बाबूजी के कहने पर ही डॉ. आंबेडकर को संविधान निर्मात्री सभा का अध्यक्ष बनवाया था। दलितों की मौजूदा स्थिति के परिप्रेक्ष्य में उनका कहानी संग्रह एक बारात और चढ़ी आज भी बेहद प्रासंगिक है।

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