प्रशासन के पास नहीं है आधार
वैसे प्रशासन भी क्या करे, यदि छुट्टी न करे, तो वे समूह मुखर हो जाते हैं, जो यह साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि बिना छुट्टी मानवता खतरे में आ जाएगी। हाल ही में दिल्ली सरकार एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शिक्षण संस्थानों में वायु की खराब गुणवत्ता के मद्देनजर छुट्टी कर दी गई है। ऐसे में छुट्टी घोषित करने के लाभ-हानि का भी आकलन होना नितांत आवश्यक है। प्रशासन से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि क्या विषैली वायु से निपटने का यही समाधान है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वायु जहरीली होती जा रही है, लेकिन संभवतया शिक्षण संस्थाओं की छुट्टी करना उसका हल नहीं है।
महाभारत के प्रसंग का उदाहारण
यदि इसे महाभारत के प्रसंग के साथ जोड़ा जाए, तो स्थिति कुछ वैसी ही है, जैसे-शुरुआत में आज की जनता रूपी अर्जुन, विषैली वायु रूपी युद्ध से बचने के लिए रथ के पीछे यानी छुट्टी पर जा कर बैठ जाता है। यदि कृष्ण न होते तो शायद कौरव यानी प्रदूषण विजयी हो जाता। आज के युग में भी उस कृष्ण की आवश्यकता है, जो प्रदूषण से मुक्ति दिला सके और जनता को नेपथ्य से निकाल सामने खड़ा कर सके।
एक नजर दूसरे पक्ष पर
दूसरा पक्ष यह भी है कि विद्यार्थियों के अतिरिक्त भी बहुत बड़ा वर्ग है, जो निरंतर विषैली वायु के संपर्क में रहता है। क्या उनकी कोई जिंदगी नहीं है? शिक्षण संस्थाओं को बंद करने के औचित्य के विश्लेषण में विद्यार्थियों के संस्थान तक पहुंचने, वहां अध्ययन करने अथवा खेलने और वापसी में हो रहे वायु संपर्क के समय को दृष्टिगत रखना होगा। घर से संस्थान तक आने के लिए ज्यादातर छात्र विद्यालय, सार्वजनिक परिवहन या निजी वाहनों का उपयोग करते हैं। शहरी परिवेश में साइकिल या पैदल का चलन न्यूनतम है। संस्थान में रहने के दौरान विद्यार्थी अधिकतम एक घंटे तक खुले में रह पाता है।
शेष समय कक्षा में ही गुजरता है, आजकल प्रार्थना सभा का चलन भी कम हो गया है और यदि औपचारिकता होती भी है, तो संबंधित कक्ष में ही हो जाती है। इसके दीगर यदि छुट्टी होती है, तो आवश्यक नहीं कि विद्यार्थी घर में ही कैद रहें। यदि आदर्श रूप से ऑनलाइन कक्षा में शत प्रतिशत पूर्ण गंभीरता से उपस्थिति मान भी लें, तो अपेक्षाकृत विषैली वायु से संपर्क छुट्टी की परिस्थिति में अधिक होता है। वैसे भी ऑनलाइन कक्षाएं अभी भी आर्थिक रूप से वंचित वर्ग के लिए चुनौती ही हैं। घर पर किसी भी रूप में पढ़ाई के लिए सौ फीसदी माहौल नहीं बन पाता।
साथ ही घर पर विषैली वायु से शून्य संपर्क हो, यह भी संभव नहीं है। छुट्टी करने की मांग ऐसे वर्ग के लोग ज्यादा उठाते हैं, जिनके बच्चे एयर प्यूरिफायर के साये में रहते हैं। लेकिन भारत में ज्यादातर आबादी छोटे या कच्चे मकानों में जीवन व्यतीत करती है और घर के हर कोने से विषैली वायु प्रवेश करती रहती है। कम से कम शिक्षण संस्थान में जाने से विद्यार्थी को चहारदीवारी का दायरा तो प्राप्त हो जाता है। अतः आकलन करना होगा कि शिक्षण की हानि कर कितना लाभ स्वास्थ्य को पहुंचाया जा रहा है। बेहतर तो यह होना चाहिए कि परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था के साथ, संस्थाओं के कक्ष वायु की गुणवत्ता सुधारने हेतु सुसज्जित किए जाएं। वैसे छुट्टी होने का सर्वाधिक लाभ निजी शिक्षण संस्थाओं को होता है, जिनकी परिवहन लागत के अतिरिक्त संस्थान की संधारण राशि में भी व्यापक बचत हो जाती है।
इस संदर्भ में दिल्ली सरकार द्वारा अपने विद्यालयों की दशा सुधारने के लिए किए जा रहे बड़े-बड़े दावों का उल्लेख करना भी उचित होगा कि जब विश्व स्तरीय कक्ष बन गए और विद्यालयों का पांच सितारा उन्नयन हो गया, तो फिर वहां पर विषैली वायु कैसे पहुंच सकती है। शिक्षण संस्थाओं की बढ़ती छुट्टियों की परिपाटी के रहते अभिभावकों को मंथन करना चाहिए कि यदि विभिन्न कारणों से अपने बच्चे को घर बैठाकर ऑनलाइन कक्षा के माध्यम से ही पढ़ाना है, तो फिर फीस का इतना बोझ क्यों ढोया जाए? साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर बहस होनी चाहिए कि विद्यालयों में अस्वच्छ वातावरण के रहते होने वाली छुट्टियों के परिपेक्ष्य में शुल्क वापस हो। इसके लिए न्यायोचित नीति बनना बहुत जरूरी है।