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उस घाटी का भीमल

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देहरादून कोई पहाड़ नहीं है। मजबूरी यह है कि वह मैदान भी नहीं है। यह वह जगह है जहां से पहाड़ की बिवाई फटती है और टखनों का पता चलता है। पहाड़ के जुगाड़ की गलियां यहां से होकर गुजरती हैं। कुछ सड़कें हैं और अंग्रेजों के जमाने के बनाए हुए बंगलों के पीछे-पीछे तिब्बतियों के छूटे सपनों का आलोक भी है।
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पर यह शहर कोई निबंध या संस्मरण नहीं है या किसी 'माई डियर ट्रेवलर' की डायरी भी नहीं है जो आपको पहाड़ की यात्राओं से पहले साजो-सामान बांधकर छुट्टी की तरह लद जाने को उकसा रहा हो। यह आपको अचानक बताता है कि यह भी कोई दूसरा ही शहर है जिससे होकर कुछ राहें तिनकों के नशेमन तक पहुंचती हैं। तो, थोड़ी सी दूर चलो ओर दिशा बदलकर चलो तो कंपनी बाग की मसूरी नहीं बांदल घाटी मिल जाती है।

जिसने निर्मल वर्मा पढ़ा है, उसने पहाड़ पढ़ा है। जिसने पंकज बिष्ट पढ़ा है, उसने भी पहाड़ पढ़ा है। और पहाड़ पर जितना पढ़ा है, पहाड़ पर जितना लिखा है, पहाड़ पर से दिल्ली की तरफ बहती अतीत की चित्र-दीर्घाएं बनाई हैं, सबसे उसका पहाड़ दूर रहता है। वहां भी राजनीतिज्ञ पैराशूट से उतरता है और छम् से एक गढ़वाली गीत पर तालियां बजाता है।
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पर, हम बीच में बैठे थे। वे अपने रजिस्टर इकट्ठा कर रही थीं। उनमें 'मीटिंग' के नोट्स लिखे थे। वह सीतापुर था, जहां रावत साहब के मकान में चैसा, गैथ और मंडवे की रोटी खाई गई थी। आस-पास के बीस गांवों से वे चलकर आई थीं। बांदल नदी के उस तरफ टिहरी जिला हुआ, इधर, देहरादून।

गेंदे के फूलों से शुरू, अतिथियों से घर के सदस्यों में बदलते हुए उन्होंने बातें शुरू कीं। 'महान विद्वान' लोगों को ये बातें नई नहीं लगेंगी। उन्हें कोई बात नई नहीं लगती, क्योंकि वे सब जानते हैं। उन्हें तो उस बच्चे का, उस मां की गोद में चुपचाप बैठना भी नया नहीं लगेगा,  जो आंखों से दूर दिखते मकान से दो घंटे की पहाड़ी दूरी जी कर आया है।

हम सरकारी आदमी नहीं हैं। हमारे पास स्कीमें नहीं हैं। हमारे पास योजनाएं बदलने की ताकत भी नहीं है। वे कहते हैं, ये पास देहरादून है और ये पास हम हैं। दोनों की दुनिया के बीच में क्या है? एक सूखी धार! एक दफे जब डायरिया फैला था तो लोग मर रहे थे। कोई सरकारी आदमी नहीं फटका। उस वक्त अखबार काम में आया। अखबार में छपा तो नींद उड़ी, लोगों को बचाने के लिए हुजूम आ गया। फिर वही दिन चार।

पहाड़ की मुश्किल जिंदगी पर लेखों से इतने कागज रंगे गए हैं कि कई पेड़ उन कागजों के बराबर पड़ जाएं, लेकिन चलो फिर-फिर उन मुश्किलों से अपने भरोसे नई कोशिशें की जाएं- इसकी चमक खोजें।

एक महिला ने कहा, 'दो-तीन सिलाई मशीनें हों तो हम चार लड़कियों को ट्रेंड करके, बाकी गांवों में, बाकी को ट्रेंड करने भेज दें।' 'पुराने घराट ठीक हो जाएं तो अपनी बिजली-चक्की चलें।' 'अदरक, धनिया, हल्दी किया, मगर भाव ठीक मिलता नहीं, लाने-ले जाने में ही जान निकल जाती है।'

'दो कुर्सियों पर बांस बांधकर एक बेचारी गर्भवती महिला को दून अस्पताल किसी तरह ले जा सके थे।' 'अरे ये सब तो ठीक है। जंगल में लड़कियों को भेजने में डर लगने लगा है। जानवरों का नहीं, लड़कों का। दारू पीते हैं, यहां अकेले में झरनों के आस-पास पड़े रहते हैं।'

जंगलों में विराट एजुकेशन इंस्टीट्यूट उग गए हैं, घूमते सहायता समूह हैं, लेकिन बांदल घाटी को अपनी ही राजधानी के करीब भूगोल, राजनीति, इतिहास, समय, पर्यावरण और विकास का विचित्र धुआंधार देखने को मिल रहा है।

कुछ पुरुष शिकायत कर रहे हैं, हमारी तो महिला सुरक्षित सीट हो गई, प्रधानी में अन्याय हो रहा है। महिलाएं पूरा घर बनाना चाहती हैं, पुरुष प्रधानी के लिए अधीर हैं।

बात सम पर आती है।

हिसाब बनाओ, सब मिलकर क्या-क्या कर सकते हैं। दूसरों के  भरोसे नहीं, अपने भरोसे। अगर कुछ चीजें जुट जाएं तो हम आगे बढ़ें। फेहरिस्त बन गई है। तारीखें तय हो गई हैं। पूरे बीस गांव अपने-अपने भरोसे, अपनी-अपनी जरूरतों को प्राथमिकता क्रम में तैयार करके अगले महीने दूसरे गांव में मिलेंगे।
बारहों मास पकने वाले बेड़ू और चैत्र के काफल की खुशबू से एक सुंदर पहाड़ी गीत उठता है-

बेडू पाको बारा मासा,
ओ नरैनी, काफल पाको चैता मेरी छैला....
बेडू पाको बारा मासा
नरैना, काफल पाको चैता मेरी छैला........

हम फिर मिलने के लिए विदा होते हैं। सरकारी शब्दकोश से शब्द उठाएं तो 'समग्र विकास' के लिए गांव के लोग योजना बना रहे हैं। हम अमर उजाला फाउन्डेशन के भरोसे का संकेत देते हैं। ओंकार सिंह, सैबलदास गुप्ता, कुणाल सत्यार्थी एक दम साथ आ जाते हैं। एफ आर आई की मेज पर डॉ. किमोठी ने बांदल घाटी का पूरा नक्शा उतार दिया है। उपग्रह से बता देंगे कि कहां पानी का मूल स्रोत है, कहां असल में प्राथमिक विद्यालय। डीपी जुयाल मिट्टी की प्रकृति, पानी की स्थिति और किए जा सकने वाले कामों की संभावनाओं पर बात कर रहे हैं। डॉ. नेगी घर में उगे चीड़ का सच बयान कर रहे हैं। बात बन रही है। काम लोग खुद करेंगे, हम साथ-साथ होंगे।

समाजसेवी अनिल जोशी को बार-बार
भीमल के पेड़ का सद्य आविष्कृत संदर्भ याद आ रहा है। उसके तने-टहनियों को रेशों में बदला जा सकता है और वे रेशे इतने मजबूत होते हैं कि उनकी बुनी चीजें सालों खराब नहीं होंगी। पूरा गांव का गांव, अपनी खाली जमीन पर भीमल-गांव बना दे तो क्या जिंदगी न बदल जाएगी?

हां, तब यह क्षण उस कविता के भय को
अपनी भीतरी शक्ति की उपस्थिति से
निरस्त कर सकेगा जिसमें विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कहते हैं-

मेरा बच्चा देख रहा है अचरज से
अपने समय का सबसे बड़ा चमत्कार
तेज नुकीले दांत, घूमता हुआ पहिया और पट्टा
बच्चा किलकता है ताली बजाकर
मैं सिहर जाता हूं

अभी वह मेरे सीने से गुजरेगी
मेरे भीतर से एक कुर्सी निकालेगी
राजा के बैठने के लिए
राजा बैठेगा सिंहासन पर
और वन-महोत्सव मनाएगा।

देहरादून के भीतर एक मॉल खड़ा हो
सकता है, कोई बात नहीं। उसके पडो़स में ही कुछ भीमल खड़े हो सकते हैं- क्या बात है! इसके बाद विकास के सूचकांक को पर्यावरणीय सूचकांक में बदलने की बात फिर कभी होगी
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ही सही .........।
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