धर्मशास्त्रों में यह स्पष्ट बताया गया है कि मंदिर में अथवा इबारत स्थल पर भगवद् भजन करना ही पूजा-उपासना नहीं है, बल्कि दूसरों की सेवा करना और दीन-दुखियों की मदद करना भी पूजा का ही एक रूप है। अगर किसी व्यक्ति में करुणा भावना नहीं है, तो यह मान लेना चाहिए कि वह सच्ची इबादत नहीं कर रहा। उसकी उपासना सफल नहीं हो सकती।
इसी से जुड़ा एक प्रसंग महान विरक्त संत स्वामी रामसुखदास जी महाराज का है। एक दिन वह ऋषिकेश के गीता भवन में प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक श्रद्धालु अपने बीमार साथियों को कमरे में अकेला छोड़कर उनका प्रवचन सुनने आ बैठा।
स्वामी जी ने उसे देखते ही कहा, भैया, तुम अपने साथी को अकेला दर्द से तड़पते छोड़कर सत्संग में क्यों आए? भगवान का असली भजन और सत्संग तो बीमार को साक्षात ईश्वर मानकर उसकी सेवा करना है।
उन्होंने सत्संग में प्रवचन करते हुए कहा, गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो व्यक्ति अपना कर्तव्य पालन करता हुए भगवान को स्मरण रखता है, वह भगवान की भक्ति ही करता है। यज्ञ, दान, सेवा, सदाचार का पालन धर्म के ही अंग हैं। जिसके हृदय में करुणा व सेवा भावना नहीं है, उसका भजन कभी सार्थक नहीं हो सकता।
स्वामी जी की प्रेरणा से वह सज्जन तुरंत अपने कमरे में गया और बीमार साथी की सेवा में लग गया।