बिहार विधानसभा चुनाव में राजग-विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, वामपंथियों ने मिलकर जिस महागठबंधन की छत्रछाया में चुनाव लड़ा, उसका घोषित आधार 'सेक्यूलरवाद' था। क्या बिहार में मोदी-नीतीश की जीत, सेक्यूलरिज्म की हार होगी?- नहीं। वास्तव में, यह उस विकृत गोलबंदी की पराजय थी, जिसका दंश भारतीय राजनीति दशकों से झेल रहा है। स्वतंत्रता के बाद देश नेहरूवादी नीतियों से जकड़ा हुआ था, जिसमें वाम-समाजवाद का प्रभाव अत्याधिक था। जब आपातकाल के दौरान 1976 में असंवैधानिक रूप से बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा रचित संविधान की प्रस्तावना में लिखे 'संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य' में 'सेक्यूलर' शब्द जोड़ दिया गया, तब स्थिति और विकृत हो गई। उस समय तक भारतीय अर्थव्यवस्था चरमरा चुकी थी। उसी दौर में तथाकथित 'सेक्यूलरवाद', 'समाजवाद' और 'सामाजिक न्याय' के घालमेल से जितने राजनीतिक दलों का उदय हुआ- उनमें से अधिकांश आज दूषित परिवारवादी व्यवस्था में भ्रष्टाचार, सत्ता में रहकर देश-विदेश में अकूत संपत्ति अर्जित, विभाजनकारी जातीय-मजहब प्रेरित राजनीति और अलगाववादी-जेहादी शक्तियों को सशक्त करने तक सीमित है।
बिहार में महागठबंधन के मुख्यमंत्री प्रत्याशी राजद नेता तेजस्वी थे। वह उस जीर्ण परिवारवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां 950 करोड़ के भ्रष्टाचार में जब उनके पिता लालू को 1997 में बिहार की कुर्सी छोड़नी पड़ी, तब उन्होंने अनुभवहीन और घर-परिवार तक सीमित अपनी पत्नी राबड़ी देवी को प्रदेश का राजकाज सौंप दिया। लालू भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में सजायाफ्ता हैं, तो राजद की कमान उनके छोटे पुत्र तेजस्वी के हाथों में है और वह भी अपने भाई तेजप्रताप के साथ रेलवे निविदा और पटना चिड़ियाघर भूमि घोटालों में अनियमितता बरतने के आरोपी हैं।
उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को भी 'सेकुलरिस्ट' तमगा प्राप्त है। जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने निरपराध रामभक्त कारसेवकों पर गोली चलाने के आदेश दिए, तो वह और उनका परिवार देश के बड़े सेक्यूलरिस्टों में से एक हो गए। दलित उत्थान के नाम पर बसपा का गठन हुआ। पर मायावती अपने जातिवादी एजेंडे को 'सामाजिक न्याय' के सांचे में ढालती रही हैं। इन दोनों दलों के शीर्ष नेता आज परिवारवाद, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता और जातिवाद के प्रतीक हैं। इनके अतिरिक्त देश में ऐसे कई क्षत्रप हैं, चाहे वह पंजाब में वर्षों तक भाजपा के सहयोगी रहे अकाली दल हों, महाराष्ट्र का ठाकरे परिवार, हरियाणा में चौटाला कुनबा, तमिलनाडु में स्टालिन या फिर आंध्र प्रदेश-तेलंगाना में जगन रेड्डी परिवार- जहां आंतरिक लोकतंत्र की भारी कमी है और सत्ता का केंद्र केवल पारिवारिक सदस्यों तक सीमित। सच तो यह है कि कांग्रेस का नेहरू-गांधी परिवार इसके लिए जिम्मेदार है, जिसका अनुसरण आज विभिन्न दल 'सेक्यूलरवाद', 'समतावाद' और 'सामाजिक न्याय' आदि रूपी नकाब पहनकर कर रहे हैं।
इन सबमें भारतीय सनातन संस्कृति विरोधी वामपंथी चिंतन ने देश की राष्ट्रीय राजनीति को सर्वाधिक विकृत और कलंकित किया है। अक्सर भारतीय वामपंथी राजनीतिक दल- लोक अधिकारों, अभिव्यक्ति, प्रजातंत्र और संविधान की बातें करते है, किंतु वे सत्तासीन होने पर उन्हीं जीवंत मूल्यों की हत्या सबसे पहले कर देते हैं। केरल में वामपंथियों द्वारा विरोधियों का दमन, असहमति के अधिकार का हनन और हिंसा- इसका उदाहरण है। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा भी लंबे समय तक इसी दंश को झेल चुके हैं। सच तो यह है कि बिहार की जनता ने न केवल 10 लाख सरकारी नौकरी के अव्यवहारिक वादे को ठुकराया है, बल्कि घोर जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति करने वाले तथाकथित सेकुलरिस्टों, जो परिवारवाद और दीमक रूपी भ्रष्टाचार से युक्त भी है- उन्हें सिरे से खारिज कर दिया।
( - लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय-उपाध्यक्ष हैं।)