हाल ही में मेरी मुलाकात एक वरिष्ठ नागरिक से हुई, जो 1990 के दशक में भारतीय रेल से सेवानिवृत्त हुए थे। वह इंजीनियरिंग के उन साहसिक कार्यों का वर्णन कर रहे थे, जिनका वह हिस्सा रहे थे, जिनमें मेट्रो मैन ई. श्रीधरन के साथ पंबन सेतु (रामेश्वरम) का पुनरुद्धार भी शामिल था। जो भी वह बता रहे थे, वह इतनी ऊर्जा और उत्साह के साथ कि मुझे उन्हें यह बताने में दुख हो रहा था कि आज इंजीनियरिंग का पेशा अपनी धीमी मौत मर रहा है। और इंजीनियरिंग से संबंधित कई नौकरियां अब अंत के कगार पर पहुंची नौकरियां बन गई हैं-ऐसी नौकरियां, जिनमें प्रगति की बहुत कम संभावना रह गई है या कोई संभावना नहीं बची है और जो उच्च वेतन दिलाने में सफल नहीं है।
1990 के दशक में ही मैंने खुद मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। मैकेनिकल इंजीनियर के तौर पर मैंने बहुत कम समय तक काम किया, क्योंकि मैं स्वचालन (ऑटोमोशन) की ओर बढ़ रहे झुकाव को महसूस कर सकता था, जिससे मेरे शीघ्र ही बेरोजगार होने का अंदेशा था। इसलिए अपने कुछ विवेकी मित्रों एवं लोगों की तरह मैं बिजनेश एडमिनिस्ट्रेशन की तरफ मुड़ गया। मैं इंजीनियरिंग के क्षेत्र से बाहर निकल आया, क्योंकि इससे अन्यत्र उपलब्ध अवसरों के लिए मेरी आंखें खुलीं। मेरे कुछ दोस्त, जो इंजीनियर के रूप में ही नौकरी करते रहे, उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा या नौकरी के लिए कंप्यूटर ऑपरेटिंग की तरफ बढ़ना पड़ा। विदेशी कंपनियों के आगमन के चलते भी लोग कंप्यूटर इंजीनियर के रूप में कंप्यूटर सांइस के क्षेत्र में चले गए। उन्हें मूल रूप से कोडिंग या प्रोग्रामिंग का काम मिला।
यह विडंबना ही है कि ये कोडर, जिन्होंने यांत्रिक, सिविल, प्रोडक्शन एवं इलेक्ट्रिकल जैसी इंजीनियरिंग की कई शाखाओं को मार डाला, आज खुद मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। वे आज छंटनी का सामना कर रहे हैं और उनमें अपने करियर के खत्म होने का डर समाया हुआ है। जब भारतीय इंजीनियरों ने कम वेतन पर काम करके अमेरिका एवं कुछ अन्य विकसित देशों के इंजीनियरों का रोजगार छीना था, तो जिन परिस्थितियों का वहां के इंजीनियरों को सामना करना पड़ा, आज वही स्थिति भारतीय इंजीनियरों के साथ है। ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और कृत्रिम ज्ञान के कारण इंजीनियरों की मांग घट गई है।
इंजीनियरों की चुनौतियां
हाल ही में तमिलनाडु एवं कर्नाटक के कई शहरों का दौरा करने के दौरान मैंने पाया कि कई इंजीनियरिंग कॉलेज या तो मुश्किलों में हैं या बंद होने के कगार पर हैं। इसका कारण है कि वहां बहुत कम छात्र दाखिला कराते हैं, क्योंकि कई लोग इंजीनियरिंग में अच्छे भविष्य की कल्पना नहीं करते। जो लोग अब भी इंजीनियरिंग कर रहे हैं, वे तेजी से धन कमाने के आकर्षण में वहां टिके हुए हैं। उनमें से ज्यादातर कंप्यूटर एप्लीकेशन या ऐप्प विकसित कर रहे हैं, जो इंसानों की जगह लेगा। जिस उत्साह और गति से वे इंसानों को विस्थापित करते हैं, ज्यादातर युवा यह समझने में असमर्थ हैं कि वह तकनीकी एक दिन उन्हें विस्थापित कर बेरोजगार बना देगी।
इसके अलावा, आज दूसरों को यह बताने में भी गर्व कि अनुभूति नहीं होती कि आप इंजीनियर हैं, क्योंकि आज इंजीनियरों के पास कोई ठोस भूमिका नहीं है। आज हमारा सामना एक सोशल मीडिया इंजीनियर से होता है, जो और कुछ नहीं, बस सॉफ्टवेयर डेवलपर है या फिर वह सिर्फ गूगल द्वारा प्रमाणित हो और खुद के इंजीनियर होने का दावा करे। इसके अलावा इंजीनियरों को एक परिसंपत्ति या दीर्घकाल के लिए मूल्यवान समझने के बजाय उन्हें एक आवश्यक बुराई के रूप में देखा जाता है। हैरानी नहीं कि इंजीनियर कंप्यूटर को इंजीनियरिंग के सबसे बड़े बदलाव के रूप में देखते हैं।
इंजीनियरिंग अब स्मार्ट करियर विकल्प नहीं रह गया है। कुछ इंजीनियर मानते हैं कि इस पेशे ने अपनी चमक खो दी है, जबकि कुछ अन्य का मानना है कि यह अब भी मान्य और संतोषजनक करियर है। लेकिन ज्यादातर उद्योग इंजीनियरों के साथ एक वस्तु के रूप में सलूक करते हैं, खासकर सॉफ्टवेयर उद्योग। एक बार फिर उस वरिष्ठ नागरिक की बात याद करते हैं, जिन्होंने अपने काम के प्रति गर्व जाहिर करते हुए कहा कि भले ही वह देर से और बेहद गंदे कपड़ों में घर लौटते थे, लेकिन उन्हें अपने काम पर गर्व था। दुर्भाग्य से आज ज्यादातर इंजीनियर काम का वैसा वातावरण चाहते हैं, जो काफी आसान और सहज हो, जो उनकी पढ़ाई के ठीक विपरीत है। उदाहरण के लिए, एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर को विद्युत उत्पादन केंद्र पर समय बिताने की आवश्यकता होगी, जहां का तापमान और माहौल आवश्यक रूप से बेहतर नहीं होगा।
इंजीनियरिंग की मौत का कारण बिना गुणवत्ता की जांच किए और संतुलन बनाए इंजीनियरिंग की सीटों में हुई वृद्धि भी है। नतीजतन कम वेतन पर इंजीनियरों की नियुक्ति होने लगी है। इसके अलावा, अन्य पेशों की तरह, जिसमें अनुभव अब परिभाषित कारक नहीं रह गया है, इंजीनियरों की नियुक्ति की उम्र भी कंपनी की प्रगति के लिए चालीस वर्ष के आसपास रखी जाती है। एक स्पष्ट भविष्य और प्रासंगिकता के बिना इंजीनियरिंग का पेशा खत्म होता जा रहा है।
छात्रों के लिए मेरी सलाह है कि जिसे भी आप अपने करियर के रूप में चुनें, उसके प्रति सावधान रहें। अगर आप इंजीनियरिंग को करियर के रूप में चुनते हैं, तो लगातार खुद को उन्नत बनाते रहें, ताकि आपकी प्रासंगिकता बनी रहे। यह प्रासंगिकता गैर इंजीनियरिंग भूमिकाओं और नौकरी में भी काम करती है। इंजीनियरिंग में प्रतिभा को वापस लाने का एकमात्र उपाय है इंजीनियरों के लिए समस्या समाधान मॉडल तैयार करना। सेवानिवृत्ति के इतने वर्षों बाद भी ई श्रीधरन अगर प्रासंगिक बने रहे, तो सिर्फ इसलिए कि उन्होंने हमेशा चुनौतियों को स्वीकार किया। बहुत कम लोग इतने भाग्यशाली होते हैं।