फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

लक्ष्मी सहगल जैसी बेटियां

सुभाषिनी सहगल अली Updated Sun, 29 Oct 2017 07:49 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
सुभाषिनी सहगल अली
अभी दो दिन पहले कैप्टन लक्ष्मी सहगल का जन्मदिन था। उस दिन, लखनऊ स्टेशन के पास एक ऐसी दुर्घटना घटी, जिसने दिल को दहलाने के साथ उसकी कमी का जबरदस्त एहसास दिलाया। रेल की पटरियों के इधर-उधर, तीन छोटी लड़कियां मिलीं। वह बहने थीं। उनकी उम्र चार साल, छह साल और सात साल के आस-पास थी। छह साल वाली तो दम तोड़ चुकी थी। जो जिंदा बचीं, उन दोनों को अस्पताल पहुंचाया गया। वहां उनसे पूछा गया कि उनके साथ क्या हुआ था, तो बड़ी वाली ने बताया कि तीनों अपने मां-बाप और अन्य रिश्तेदारों के साथ लुधियाना से ट्रेन में आ रहे थे। उनके पिता और चाचा ने उन तीनों और मां को लखनऊ के पास डिब्बे से पटरी पर फेंक दिया। उनकी मां की भी पटरियों पर मौत हो गई। 


लड़कियों को लोग आज भी जिंदा देखना ही नहीं चाहते हैं। हो सके, तो उन्हें पैदा होने से पहले ही मार देते हैं। अगर वह पैदा हो जाती हैं, तो उसके बाद उन्हें मारने की कोशिश करते हैं। अगर वह पढ़ना चाहती हैं, तो उनको बाहर की दुनिया का डर दिखाते हैं। अगर अपनी मन की शादी करने की कोशिश करती हैं, तो जान से मार डालते हैं। अगर मां-बाप की मर्जी से शादी करती हैं, तो यह काम अक्सर उनके ससुराल वाले कर डालते हैं।


कोई यह सोचकर कि उनके घर में पैदा लड़की भी कैप्टन लक्ष्मी बन सकती है, उसका पालन-पोषण प्यार से नहीं करता, उसको आत्म-सम्मानी बनाने की कोशिश नहीं करता। लेकिन कैप्टन लक्ष्मी खुद ऐसा सोचती थीं। जब भी उन्हें कोई सराहने की कोशिश करता – और हजारों ने यह कोशिश की होगी – तो वह उसे डाट देती थीं। कानपुर में पचास साल से अधिक समय बिताने के बाद भी उनकी हिंदी वैसी ही थी, जैसी कि उनकी जैसी दक्षिण भारत की बहुत-सी महिलाएं बोलती हैं। तो वह डांट के कहतीं – 'हमने ऐसा क्या किया? अरे हमारा मां-बाप ने हमको वैसा ही पाला जैसा हमारा भाई लोगों को पाला था। हमको पढ़ाया। हम डॉक्टर बना। हमको कभी कुछ भी करने से मन नहीं किया, तो हम डॉक्टर बनकर सिंगापुर गया। वहां बहुत लोगों का इलाज किया।


गरीब लोग का ही करता था। पैसे वाले का बहुत डॉक्टर होता है। फिर हमको नेताजी (सुभाष) मिला। उसने बोला महिला लोग को भी आजादी के लिए लड़ना है। क्या तुम हमारा साथ एक महिला रेजीमेंट बनाने में मदद करोगे? मैंने हां बोला और दूसरे दिन अपना दवाखाना बंद करके काम शुरू कर दिया। कितना औरत लोग और लड़की भाग-भाग कर हमारे पास आया। उनको हम लोगों ने ट्रेनिंग दिया। यूनिफार्म पहनाया। बंदूक चलाना सिखाया और वह फौजी बन गया। उनके अंदर डर खत्म हो गया। एक दिन नेताजी शाम को कैंप में आया था। उनको ‘पासवर्ड’ याद नहीं था, तो उनको भी रोक दिया। नेताजी बहुत खुश हो गया। बोला, यह लड़की लोग तो बिलकुल शेरनी बन गया है। हमसे भी नहीं डरता!' 


ऐसी थीं कैप्टन लक्ष्मी। उनका जन्म मद्रास (चेन्नई) में 1915 में लक्ष्मी पूजा के दिन हुआ था। देश आजाद हुआ और वह कानपुर आ गईं। पंजाब से आए शरणार्थियों और कानपुर के गरीबों की डाक्टर बन गईं। अपने दवाखाने के सामने एक नोटिस लगा दिया ‘बेटा या बेटी पैदा करना औरत का शरीर नहीं, पुरुष का शरीर तय करता है’। इस पर चर्चा तो बहुत होती थी, लेकिन यकीन कम ही होता था। 24 अक्टूबर को उनका जन्मदिन था। देश भर में हजारों लोगों ने उन्हें प्यार और आदर से याद किया। लेकिन उसी दिन, तीन छोटी बहनों को ट्रेन से फेंककर मार डालने की कोशिश की गई। जिस बराबरी के अधिकार के लिए उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया, अभी उसकी मंजिल बहुत दूर है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next