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बेटियों के खिलाफ खड़ी मशीनें

Mon, 24 Jun 2013 08:53 PM IST
मनीषा सिंह
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वे कहीं भी सुरक्षित नहीं। न गर्भ में, न उससे बाहर। हमारे दिलों में उनके लिए स्नेह सूख चला है और उसकी जगह निपट आक्रामकता ने ले ली है। एक समाज के तौर पर हम पुरुषवादी मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, जिसका खामियाजा बेटियों को भुगतना पड़ता है। ताजा मामला बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान और उनकी पत्नी गौरी खान के अजन्मे बच्चे से जुड़ा है। जो खबरें आई हैं, उनके मुताबिक शाहरुख और गौरी जानते हैं कि किराये की कोख यानी सरोगेट मदर के जरिये उनके घर जो तीसरा बच्चा आने वाला है, वह बेटा है।
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अजन्मे बच्चे के लिंग निर्धारण की जांच हमारे देश में कानूनी जुर्म है। यों तो महाराष्ट्र के स्वास्थ्य विभाग ने इस मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं और यदि खान-दंपति दोषी पाए जाते हैं, तो मुमकिन है कि इसके लिए वे निर्धारित सजा के हकदार भी हों। जांच के बिना उन्हें कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता, मगर इस खबर ने तकनीक के जरिये गैरकानूनी तरीके से लिंग निर्धारण के मुद्दे की ओर एक बार फिर ध्यान खींचा है।

पर यह अजीब बात है कि कानून और सजाएं होते हुए भी लोग चोरी-छिपे बेटियों से निजात पाने का हर नुस्खा अमल में ला रहे हैं। खास तौर से अमीर तबके का यह रवैया समझ से परे है कि बेटी हो या बेटा, उसकी परवरिश पर होने वाले खर्च की जब उसे कोई परवाह नहीं है, तो वह सिर्फ और सिर्फ बेटों की ही चाहत क्यों रखता है? धनी राज्यों, जैसे पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के रसूखदार दक्षिणी इलाकों में बेटों के मुकाबले बेटियों की जन्म दर बेहद कम है। शायद इन इलाकों की हजारों आलीशान कोठियों में अरसे से किसी बेटी की किलकारी न गूंजी हो।
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हम चाहें तो इस कुत्सित प्रवृत्ति के लिए विज्ञान और तकनीक को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं। सरोगेसी और अल्ट्रासाउंड तकनीक ने इंसान को फिलहाल यह सुविधा दे दी है कि वह अपने बच्चे के लिंग का चयन कर सके, उसके लिंग का पता लगा सके और यदि वह बेटी है, तो उसे गर्भ में ही मारने के औजार भी विज्ञान ने दे दिए हैं। आगे चलकर डीएनए तकनीक के सहारे मुमकिन है कि लोग अपनी इस सोच के मुताबिक बच्चे को डिजाइन भी करवा लें।

लेकिन गर्भ की विकृतियों का पता लगाने के मकसद से अल्ट्रासाउंड मशीनों का जो इस्तेमाल दुनिया में शुरू हुआ था, उसके बारे में तो शायद उसके आविष्कारकर्ता ने भी नहीं सोचा होगा कि भारत में इन मशीनों का ऐसा इस्तेमाल होगा। हमारी सरकार ने देश में कन्या भ्रूण हत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए लिंग परीक्षण को अपराध घोषित कर रखा है, लेकिन अल्ट्रासाउंड जांच करने वाले क्लीनिकों ने गर्भ की जांच की आड़ में चोरी-छिपे यह सच जानने और बताने का काम अब तक जारी रखा है- यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है।

शायद इसकी एक वजह कानूनों पर सख्ती से अमल का अभाव हो। यह सच हो सकता है, क्योंकि प्री-नैटल डायग्नॉस्टिक टेक्नीक (रेग्युलेशन ऐंड प्रिवेंशन ऑफ मिसयूज) ऐक्ट, 1994 वजूद में आने के दशक भर बाद तक किसी को इन मामलों में पकड़ कर सजा नहीं दी गई थी, जबकि इस बीच गर्भ में ही लाखों कन्या भ्रूणों को नष्ट करने की खबरें अखबारों में आती रहीं। इसके लिए पहली बार पलवल, फरीदाबाद में क्लीनिक चला रहे एक डॉक्टर और उसके सहायक को दोषी मान कर 2007 में हरियाणा की एक अदालत ने सजा सुनाई थी। उन्हें अपने क्लीनिक में भ्रूण की लिंग जांच करते हुए एक छापे के दौरान अक्टूबर, 2001 में रंगे हाथों पकड़ा गया था।
 
माना गया कि देश में करीब 50 लाख बेटियों की बलि चढ़ने के बाद इतिहास में पहली बार गर्भ में लिंग परीक्षण करने के दोषियों को सजा दी गई। इस सजा से यह उम्मीद भी की गई कि इससे हमारा समाज कुछ सबक लेगा और लैंगिक अनुपात में आते भयावह अंतर पर कोई रोक लग सकेगी। लेकिन हमारे देश में दस-बीस बरसों में कन्या भ्रूण हत्याओं का घातक ट्रेंड स्थापित हुआ है। सभी जानते हैं कि लैंगिक अनुपात में आई इस घनघोर तब्दीली के सामाजिक-आर्थिक नतीजे बेहद डरावने हो सकते हैं, पर शायद ही कोई सबक लेने का इच्छुक दिखाई देता है।
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