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इस निरंकुश आजादी के खतरे

Fri, 14 Dec 2012 08:45 PM IST
अरुण नेहरू
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अभिव्यक्ति एवं प्रेस की आजादी पर लाखों शब्द लिखे गए हैं। सोशल मीडिया और उन्नत प्रौद्योगिकी के इस जमाने में लगभग हर कोई कहीं भी, जो भी मन में आता है, व्यक्त कर सकता है। उस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हम सम्मान करते हैं। यही वजह है कि जब दिवंगत शिवसेना नेता की अंत्येष्टि के बारे में फेसबुक पर टिप्पणी करने वाली दो युवतियों को गिरफ्तार किया गया था, तो काफी हंगामा मचा था।
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लेकिन हाल में ऑस्ट्रेलियाई रेडियो स्टेशन द्वारा किए गए हॉक्स कॉल जैसी घटनाओं का उपचार क्या है, जिसके चलते 46 वर्षीय भारतीय नर्स जेसिंथा सल्ढाना ने, जो दो बच्चों की मां भी थी, खुदकुशी कर ली। शरारत करने वालों ने बेशक माफी मांग ली, लेकिन पीड़ित परिवार के लिए इन शब्दों का आखिर क्या मतलब है! क्या अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए ऐसा करना रेडियो स्टेशन और हॉक्स काल करने वाले दोनों रेडियो जॉकियों का काम अपराध नहीं है? यह कैसी आजादी है, जो किसी को बदनाम कर सकती है और किसी निर्दोष की जान ले लेती है?

हाल के वर्षों में हॉक्स कॉल एवं स्टिंग ऑपरेशन मान्य तरीके बन गए हैं, लेकिन ये कई बार चीजों को बिगाड़ सकते हैं, जैसा कि हमने जी न्यूज एवं जिंदल विवाद में देखा है। ऐसी स्थिति में यदि मीडिया खुद को पीड़ित बताता है, तो यह हैरान करने वाला होगा। इससे पहले हम ब्रिटेन में न्यूज ऑफ द वर्ल्ड का पतन देख चुके हैं, और उससे पहले जूलियन असांजे और विकिलीक्स का हश्र भी। ऐसा लगता है कि इन घटनाओं के बाद टैब्लॉयड प्रेस अपनी नीतियों में बदलाव करेंगे।
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मुश्किल यह है कि हम सभी 'अति' होते देखते रहते हैं। ऐसे में क्या आत्मनियंत्रण ही इसका समाधान होगा या नीति-नियंताओं द्वारा व्यावसायिक हितों के बजाय जनहित की रक्षा के लिए कदम उठाने से पहले हम और नुकसान की प्रतीक्षा करेंगे! व्यावसायिक घरानों द्वारा मीडिया में निवेश बढ़ा है। यदि वे मीडिया के हितों की अनदेखी कर तंत्र को मनमानी की छूट देंगे, तो अपने व्यावसायिक हितों की तुलना में ज्यादा जोखिम उठाएंगे।

बीते दिनों संसद में एफडीआई के मुद्दे पर जिस तरह मतदान हुआ, उससे मुझे हैरानी नहीं हुई। सपा एवं बसपा ने वही रुख अपनाया, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी। ऐसे में राजनीतिक तर्क लोकसभा चुनाव के मई, 2014 में होने के संकेत करते हैं। हां, किसी राजनीतिक दुर्घटना की स्थिति में चुनाव अक्तूबर-नवंबर, 2013 में हो सकते हैं। एफडीआई के मुद्दे पर वाम दल अब भी विवादों में उलझे हैं, जबकि भाजपा को व्यवसायी वर्ग का अपना वोट बैंक बचाना है।

जाहिर है, यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि चुनाव नजदीक हैं। पर क्या दोनों पक्षों ने इसकी तैयारी की है, क्या वे यह मानते हैं कि बसपा या सपा उन्हें समर्थन देगी? उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीट इन दोनों क्षेत्रीय दलों के लिए अहम हैं। अगले लोकसभा चुनाव में सीटों के लिहाज से यही दोनों दल क्षेत्रीय पार्टियों में पहले और दूसरे स्थान पर रहेंगे।

सवाल यह भी है कि क्या उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक मत खिसकेगा। प्रारंभिक संकेत दर्शाते हैं कि जिलों में आपराधिक माफिया तत्वों के उभार से सभी समुदायों में असुरक्षा बढ़ी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के राज में कानून-व्यवस्था काफी प्रभावी एवं नियंत्रण में थी। मुलायम सिंह एवं अखिलेश को सपा कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण रखना होगा। अल्पसंख्यक मतों में किसी भी तब्दीली का सभी दलों पर व्यापक असर पड़ेगा और सपा एवं बसपा के दोहरे दबाव में रहने वाली कांग्रेस एवं भाजपा को अपना खोया जनाधार पाने का मौका मिलेगा।

मुलायम सिंह ने वाम ताकतों के साथ एक गठजोड़ की पहल की है। उधर नीतीश कुमार ने गुजरात का चुनावी नतीजा आने से पहले ममता बनर्जी के साथ बातचीत शुरू की है। स्पष्ट है कि शुरुआती स्तर पर हम क्षेत्रीय दलों में दो धर्मनिरपेक्ष ध्रुव बनते देख रहे हैं। हैरानी इसको लेकर है कि ऐसे में अन्नाद्रमुक क्या करेगी, क्योंकि जयललिता किसी भी क्षेत्रीय नेता के साथ दोयम दर्जे की भूमिका में नहीं रहना चाहेंगी।

गुजरात में पहले चरण का चुनाव संपन्न हो गया है। पर सवाल है कि क्या नरेंद्र मोदी 130 से ज्यादा सीटें हासिल कर पाएंगे या क्या कांग्रेस उन्हें 110 से 115 सीटों तक सीमित रखने में सक्षम हो पाएगी। दोनों ही स्थितियों में भाजपा के भीतर और बाहर प्रतिक्रिया होगी। हिमाचल के चुनाव के बारे में कुछ भी कहना असंभव है। ताजा जानकारी के मुताबिक, कांग्रेस 33 और भाजपा 28 सीटों पर आगे रहेगी। सात सीटों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, जिसमें एक सीट माकपा एवं एक सीट निर्दलीय का भी शामिल है। लेकिन स्पष्ट है कि जीत-हार का अंतर बहुत कम रहेगा।

कांग्रेस एवं भाजपा की तात्कालिक प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि संसद सत्र के बाकी बचे दिनों का उपयोग महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवाने में करें। हमें एफडीआई के मुद्दे से आगे बढ़ना होगा। यूपीए को आर्थिक मोर्चे पर बेहतर काम करके अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना होगा। एफडीआई सिर्फ वालमार्ट तक सीमित नहीं है और अमेरिका में यदि उसकी एक लॉबी है, तो इस पर हैरान होने की जरूरत नहीं है (ज्यादातर सरकारों में लॉबिंग समूह होते हैं)। क्या हम अमेरिका में होने वाली हर गतिविधि की निगरानी करेंगे?
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